क्या है चीन का नया जातीय एकता कानून? अल्पसंख्यकों की पहचान और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर बढ़ीं चिंताएं
चीन में नया जातीय एकता कानून लागू हो गया है। सरकार इसे राष्ट्रीय एकता का कदम बता रही है, जबकि मानवाधिकार संगठनों ने अल्पसंख्यकों की स्वतंत्रता पर चिंता जताई है।
चीन में ‘जातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देने संबंधी कानून’ (लॉ ऑन प्रमोटिंग एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस) 1 जुलाई से लागू हो गया है। चीनी सरकार का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य देश के विभिन्न जातीय समुदायों के बीच साझा राष्ट्रीय पहचान विकसित करना और ‘चीनी राष्ट्र के साझा समुदाय’ की अवधारणा को मजबूत करना है।
यह कानून पिछले एक दशक से चल रही नीति का विस्तार माना जा रहा है। इसकी शुरुआत वर्ष 2014 में राष्ट्रपति शी चिनफिंग के नेतृत्व में आयोजित केंद्रीय जातीय कार्य सम्मेलन से हुई थी। इसके बाद चीन ने राष्ट्रीय एकीकरण और सांस्कृतिक समरसता को बढ़ावा देने वाली कई नीतियां लागू कीं।
नए कानून के तहत मंदारिन भाषा के अधिक व्यापक उपयोग, वैचारिक शिक्षा और धर्मों के ‘चीनीकरण’ (सिनिसाइजेशन) को कानूनी आधार दिया गया है। इसका उद्देश्य धार्मिक गतिविधियों और परंपराओं को चीन के कानूनों और राष्ट्रीय नीतियों के अनुरूप ढालना बताया गया है।
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हालांकि, इस कानून को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता भी जताई जा रही है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (ओएचसीएचआर) ने कहा है कि यह कानून विशेष रूप से जातीय और धार्मिक अल्पसंख्यकों की सांस्कृतिक तथा धार्मिक स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है। मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि इससे जबरन सांस्कृतिक समायोजन (फोर्स्ड असिमिलेशन) का खतरा बढ़ सकता है।
चीन आधिकारिक तौर पर 56 जातीय समूहों को मान्यता देता है। इनमें हान समुदाय देश की कुल आबादी का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा है। वर्ष 2020 की जनगणना के अनुसार, चीन में जातीय अल्पसंख्यकों की आबादी 12.5 करोड़ से अधिक है, जो कुल आबादी का लगभग 8.89 प्रतिशत है।
इन अल्पसंख्यक समुदायों में करीब 1.1 करोड़ उइगर और लगभग 70 लाख तिब्बती शामिल हैं। हाल के वर्षों में उइगर और तिब्बती समुदायों की सांस्कृतिक एवं धार्मिक पहचान को लेकर चीन की नीतियां अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय रही हैं। ऐसे में इस नए कानून को लेकर वैश्विक स्तर पर नजरें टिकी हुई हैं।
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