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ऐसी मुठभेड़ें अब सामान्य होती जा रही हैं: यूपी में गिरफ्तारी से पहले पैर में गोली मारने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यूपी में संदिग्धों को पैर में गोली मारकर गिरफ्तार करने की घटनाएं सामान्य होती जा रही हैं और यह पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।

उत्तर प्रदेश में पुलिस द्वारा संदिग्धों को पैर में गोली मारकर गिरफ्तार करने की घटनाओं पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि इस तरह की पुलिस मुठभेड़ें अब राज्य में “एक नियमित चलन” बनती जा रही हैं और कई मामलों में इन्हें “वरिष्ठ अधिकारियों को खुश करने या आरोपियों को सबक सिखाने” के उद्देश्य से अंजाम दिया जा रहा है।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकलपीठ ने उस समय की, जब वह तीन अलग-अलग जमानत याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे थे। ये याचिकाएं उन आरोपियों की थीं, जिन्हें पुलिस ने अलग-अलग जिलों में पैर में गोली मारने के बाद गिरफ्तार किया था। इनमें मुजफ्फरनगर निवासी अनस, झांसी के दीपक लोहापिटा और मिर्जापुर के राजू उर्फ राजकुमार शामिल हैं।

अदालत ने कहा कि उसके समक्ष बार-बार ऐसे मामले आ रहे हैं, जिनमें पुलिस मामूली अपराधों, जैसे चोरी, के मामलों में भी कथित मुठभेड़ दिखाकर अंधाधुंध फायरिंग का सहारा ले रही है। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर इस तरह की कार्रवाई गंभीर सवाल खड़े करती है।

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पीठ ने यह भी कहा कि किसी आरोपी को गिरफ्तार करने की प्रक्रिया कानून के दायरे में रहकर होनी चाहिए और पुलिस को अपने अधिकारों का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। अदालत के अनुसार, यदि इस तरह की घटनाओं पर समय रहते रोक नहीं लगाई गई, तो यह पुलिसिंग प्रणाली और न्याय व्यवस्था दोनों की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को उत्तर प्रदेश में पुलिस मुठभेड़ों को लेकर चल रही बहस के संदर्भ में अहम माना जा रहा है। इससे पहले भी विभिन्न मंचों पर पुलिस की कथित ‘एनकाउंटर नीति’ को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

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