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1947 की सीमित ताकत से आत्मनिर्भर वायुसेना तक: 1965, 1971 और कारगिल में भारतीय वायुसेना का गौरवशाली सफर

1947 की सीमित क्षमता वाली रॉयल इंडियन एयर फोर्स से आधुनिक भारतीय वायुसेना तक का सफर संघर्ष, तकनीकी विकास, युद्धों में सफलता और आत्मनिर्भरता की मिसाल रहा है।

स्वतंत्रता के 79 वर्षों में भारतीय वायुसेना ने सीमित संसाधनों वाली रॉयल इंडियन एयर फोर्स से आधुनिक और आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ती ताकतवर वायुसेना तक का लंबा सफर तय किया है। 1947 में आजादी के समय विभाजन के कारण वायुसेना के करीब एक-तिहाई स्क्वाड्रन और संसाधन पाकिस्तान के हिस्से में चले गए थे। इसके बावजूद भारतीय पायलटों और वैज्ञानिकों ने सीमित क्षमताओं के साथ देश की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वायु सेना के सेवानिवृत्त ग्रुप कैप्टन और वायु सेना पदक से सम्मानित राजीव कुमार नारंग ने बताया कि रॉयल इंडियन एयर फोर्स की स्थापना 8 अक्टूबर 1932 को कराची के ड्रिग रोड पर हुई थी। आजादी के बाद यह स्थान पाकिस्तान में चला गया। शुरुआती दौर में संसाधनों की कमी के बावजूद भारतीय वायुसेना ने जम्मू-कश्मीर में कबायली हमले के दौरान सैनिकों और आवश्यक सामान की आवाजाही सुनिश्चित की।

इसके बाद वायुसेना ने प्रोपेलर विमानों से सुपरसोनिक लड़ाकू विमानों तक का सफर तय किया। 1951 में भारत ने अपना पहला स्वदेशी ट्रेनर विमान एचटी-2 बनाया। समय के साथ भारतीय वायुसेना ने रूस, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य देशों में बने विभिन्न प्रकार के लड़ाकू, परिवहन और हेलीकॉप्टर संचालित किए।

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1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में वायुसेना ने थलसेना के साथ मिलकर प्रभावी कार्रवाई की। वहीं 1971 के युद्ध में भारतीय वायुसेना ने पूर्वी पाकिस्तान के आसमान पर महत्वपूर्ण बढ़त हासिल की। हेलीकॉप्टरों ने एयर ब्रिज बनाकर भारतीय सैनिकों को नदियों और जल बाधाओं के पार पहुंचाया, जिससे पाकिस्तानी सेना पर रणनीतिक दबाव बढ़ा।

1999 के कारगिल युद्ध में वायुसेना ने ऑपरेशन सफेद सागर के तहत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऊंची चोटियों पर मौजूद पाकिस्तानी ठिकानों के खिलाफ मिराज-2000 विमानों का इस्तेमाल किया गया। युद्ध के दौरान पुराने बमों में लेजर गाइडेड किट लगाकर उन्हें सटीक हथियारों में बदला गया।

नारंग के अनुसार, कारगिल में भारतीय वायुसेना ने युद्ध के बीच तकनीकी नवाचार और रणनीतिक बदलाव की क्षमता दिखाई। आज स्वदेशी हेलीकॉप्टर और ट्रेनर विमानों के इस्तेमाल के साथ भारत 2047 तक पूरी तरह आत्मनिर्भर वायुसेना बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

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