सारनाथ को यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने पर पीएम मोदी ने जताई खुशी, बोले- गर्व का क्षण
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सारनाथ को यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने पर खुशी जताई। उन्होंने इसे भारत की सभ्यता, आध्यात्मिक विरासत और भगवान बुद्ध के संदेश की वैश्विक पहचान बताया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के सारनाथ को यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन) की विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने पर खुशी व्यक्त की है। उन्होंने इसे हर भारतीय के लिए गर्व का क्षण बताया और कहा कि सारनाथ भगवान बुद्ध के ज्ञान, करुणा और मानवता के संदेश का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सारनाथ को लेकर कहा कि यह उपलब्धि भारत की गहरी सभ्यता और आध्यात्मिक विरासत का सम्मान है।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि उत्तर प्रदेश के सारनाथ को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया जाना बहुत खुशी और गर्व की बात है। उन्होंने कहा कि सारनाथ का संबंध भगवान बुद्ध से है, जिनका ज्ञान, दया और मेलजोल का संदेश पूरी दुनिया को प्रेरणा देता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस मान्यता के बाद दुनिया भर से अधिक लोग सारनाथ आएंगे और भगवान बुद्ध के आदर्शों से जुड़ेंगे।
सारनाथ अब भारत का 45वां और उत्तर प्रदेश का चौथा यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल बन गया है। लगभग 28 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद भगवान बुद्ध की प्रथम धर्मदेशना स्थली को यह वैश्विक पहचान मिली है। यह घोषणा दक्षिण कोरिया के बुसान में आयोजित यूनेस्को विश्व धरोहर समिति के 48वें सत्र में की गई।
सारनाथ को पहली बार 3 जुलाई 1998 को यूनेस्को की संभावित सूची में शामिल किया गया था। अब इसकी आधिकारिक मान्यता मिलने से उत्तर प्रदेश के बौद्ध पर्यटन सर्किट को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती मिलने की उम्मीद है।
यूनेस्को की विश्व धरोहर संपत्ति में चौखंडी स्तूप और सारनाथ के पुरातात्विक अवशेष शामिल हैं। चौखंडी स्तूप भगवान बुद्ध और उनके पांच प्रथम शिष्यों के मिलन का प्रतीक है। वहीं, पुरातात्विक परिसर में धामेक स्तूप, धर्मराजिका स्तूप, प्राचीन विहारों के अवशेष और अशोक स्तंभ जैसे महत्वपूर्ण स्मारक शामिल हैं।
सारनाथ वही पवित्र स्थान है, जहां भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश दिया था और धर्मचक्र प्रवर्तन की शुरुआत की थी। प्राचीन बौद्ध ग्रंथों में इसे ‘ऋषिपत्तन’ के नाम से भी जाना जाता है। करीब 2600 वर्षों से यह स्थल बौद्ध आस्था, शांति और ज्ञान का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।