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बंगाल में अल्पसंख्यक मोर्चा बनाने की तेज़ होती कोशिशें, क्या तृणमूल कांग्रेस को चिंता करनी चाहिए?

बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले अल्पसंख्यक मोर्चा बनाने की चर्चाएं तेज़ हैं, जो कुछ इलाकों में टीएमसी के लिए चुनौती बन सकती हैं, हालांकि ममता बनर्जी अब भी मुस्लिम मतदाताओं की पहली पसंद हैं।

जैसे-जैसे पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, राज्य की राजनीति में नए समीकरण उभरते दिखाई दे रहे हैं। खासतौर पर अल्पसंख्यक नेतृत्व वाले एक संभावित मोर्चे को लेकर चर्चाएं तेज़ हो गई हैं, जो कुछ क्षेत्रों में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए चुनौती बन सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार, बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं के लिए अब भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को सत्ता से दूर रखने का सबसे मजबूत विकल्प बनी हुई हैं। हालांकि, यदि कोई वैकल्पिक गठबंधन आकार लेता है, तो वह कुछ चुनिंदा इलाकों में टीएमसी की स्थिति को कमजोर कर सकता है।

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के बेलडांगा इलाके में राष्ट्रीय राजमार्ग 12 के किनारे एक ज़मीन का टुकड़ा इन राजनीतिक बदलावों का प्रतीक बन गया है। पुलिस बैरिकेड्स से घिरी इस जगह पर लाल ईंटों का ढेर, एक अस्थायी मंच और एक बैनर लगा है, जिस पर इसे ‘नई बाबरी मस्जिद’ का स्थल बताया गया है। यह दृश्य न केवल स्थानीय लोगों का ध्यान खींच रहा है, बल्कि चुनावी राजनीति में धार्मिक और पहचान से जुड़े मुद्दों के बढ़ते प्रभाव को भी दर्शाता है।

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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि अल्पसंख्यक मतों का बिखराव होता है और कोई नया मोर्चा विश्वसनीय विकल्प के रूप में उभरता है, तो वह कुछ विधानसभा क्षेत्रों में मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकता है। हालांकि, राज्य स्तर पर टीएमसी की मजबूत पकड़ को देखते हुए यह चुनौती सीमित क्षेत्रों तक ही सिमटी रह सकती है।

आने वाले हफ्तों में यह साफ होगा कि क्या यह संभावित मोर्चा सिर्फ चर्चा तक सीमित रहेगा या वास्तव में बंगाल की चुनावी राजनीति में कोई बड़ा बदलाव ला पाएगा।

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