ब्राज़ील में कार्य सप्ताह घटाकर 40 घंटे किया गया, राष्ट्रपति चुनाव से पहले लूला को बड़ी राजनीतिक जीत
ब्राज़ील की संसद ने कार्य सप्ताह को अधिकतम 40 घंटे तक सीमित करने वाले संवैधानिक संशोधन को मंज़ूरी दी, जिससे करीब तीन करोड़ श्रमिक प्रभावित होंगे और राष्ट्रपति लूला को चुनावी बढ़त मिल सकती है।
ब्राज़ील की संसद ने एक ऐतिहासिक संवैधानिक संशोधन को मंज़ूरी दे दी है, जिसके तहत देश में साप्ताहिक कार्य समय को घटाकर अधिकतम 40 घंटे कर दिया जाएगा। इस फैसले से देश के लगभग तीन करोड़ श्रमिकों के कार्य जीवन में बदलाव आने की उम्मीद है। नए प्रावधान के तहत छह दिन के कार्य सप्ताह पर रोक लगा दी गई है, जिससे कई श्रमिकों को सप्ताह में एक अतिरिक्त अवकाश मिल सकेगा। यह संशोधन ऐसे समय पर पारित हुआ है जब देश राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे दौर की तैयारी कर रहा है, जो दो सप्ताह से भी कम समय में होने वाला है। वामपंथी राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ने इस संशोधन को लेकर जोरदार अभियान चलाया था, और इसे अपनी सरकार की श्रमिक-हितैषी नीतियों के प्रमाण के रूप में पेश किया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह विधायी जीत चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में लूला के पक्ष में माहौल बना सकती है। पहले दौर के मतदान में लूला अपने प्रतिद्वंद्वी, दक्षिणपंथी सीनेटर फ्लाविओ बोल्सोनारो से पीछे रह गए थे। ऐसे में यह संवैधानिक बदलाव उनके लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक हथियार बन सकता है, क्योंकि श्रमिक वर्ग के बीच इस कदम को व्यापक समर्थन मिलने की संभावना जताई जा रही है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, लूला इस संशोधन के जरिए यह संदेश देना चाहते हैं कि उनकी सरकार आम मेहनतकश जनता के कल्याण के प्रति प्रतिबद्ध है, जबकि विपक्षी खेमे पर कॉर्पोरेट हितों के पक्षधर होने के आरोप लगाए जा रहे हैं। हालांकि इस संशोधन को लेकर व्यापार जगत और नियोक्ता संगठनों की प्रतिक्रिया मिली-जुली रही है। कुछ उद्योग संगठनों ने आशंका जताई है कि कार्य घंटे घटाने से उत्पादन लागत बढ़ सकती है और छोटे व्यवसायों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ सकता है। वहीं श्रमिक संगठनों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे दशकों पुरानी मांग की पूर्ति बताया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह विधायी बदलाव चुनावी नतीजों पर किस हद तक असर डालता है। फ्लाविओ बोल्सोनारो के खेमे ने अभी तक इस संशोधन पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे चुनाव से ठीक पहले लूला सरकार की एक सुनियोजित रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। दूसरे दौर का मतदान नजदीक आते ही दोनों उम्मीदवारों के बीच प्रतिस्पर्धा और तेज़ होने की उम्मीद है।
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