बलूचिस्तान फिर चर्चा में, क्या है इसका इतिहास और पाकिस्तान के लिए क्यों है अहम?
बलोच नेता मीर यार बलोच के दावे के बाद बलूचिस्तान फिर चर्चा में है। जानिए इस क्षेत्र का इतिहास, विद्रोह की वजह और पाकिस्तान व चीन के लिए इसका महत्व।
बलोच नेता मीर यार बलोच के कथित “रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान” से जुड़े एक सोशल मीडिया पोस्ट के बाद बलूचिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है। वायरल हो रहे इस दावे में बलूचिस्तान को स्वतंत्र देश घोषित करने और नए प्रशासनिक ढांचे, राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान तथा मुद्रा की घोषणा की बात कही गई है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस घटनाक्रम ने लंबे समय से चले आ रहे बलूच आंदोलन को फिर सुर्खियों में ला दिया है।
बलूचिस्तान पाकिस्तान का क्षेत्रफल के हिसाब से सबसे बड़ा प्रांत है, लेकिन आबादी के मामले में यह सबसे कम जनसंख्या वाला क्षेत्र है। यह ईरान और अफगानिस्तान की सीमा से लगा हुआ है और अरब सागर के किनारे स्थित होने के कारण इसका रणनीतिक महत्व बहुत अधिक है। यहां तांबा, सोना, प्राकृतिक गैस, कोयला और कई दुर्लभ खनिजों के बड़े भंडार मौजूद हैं।
1947 में भारत के विभाजन के समय बलूचिस्तान में कलात, मकरान, लास बेला और खारन जैसी रियासतें थीं। इनमें कलात सबसे प्रभावशाली रियासत थी। कलात के शासक मीर अहमद यार खान ने 11 अगस्त 1947 को इसे स्वतंत्र घोषित किया था। हालांकि बाद में राजनीतिक घटनाक्रमों के चलते 20 मार्च 1948 को कलात पाकिस्तान का हिस्सा बन गया।
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बलूचिस्तान में विद्रोह की शुरुआत दशकों पहले हुई थी। अलगाववादी संगठनों का आरोप है कि पाकिस्तान की केंद्र सरकार ने क्षेत्र की स्वायत्तता, प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांगों को नजरअंदाज किया है। वहीं पाकिस्तान सरकार इन आंदोलनों को देश विरोधी गतिविधियां बताती रही है।
बलूचिस्तान लंबे समय से पाकिस्तान के आंतरिक संघर्ष का केंद्र रहा है। बलूच राष्ट्रवादी समूहों का कहना है कि क्षेत्र के संसाधनों का इस्तेमाल तो किया गया, लेकिन स्थानीय विकास पर्याप्त नहीं हुआ। इसी कारण कई दशकों से अलगाववादी आंदोलन जारी है।
चीन के लिए भी बलूचिस्तान बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां स्थित ग्वादर बंदरगाह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) का अहम हिस्सा है। यह परियोजना चीन को अरब सागर तक पहुंच देने और व्यापारिक मार्गों को मजबूत करने के उद्देश्य से बनाई गई है।
हालांकि बलूचिस्तान के तुरंत स्वतंत्र देश बनने की संभावना फिलहाल कम मानी जाती है। पाकिस्तान की सैन्य ताकत और अंतरराष्ट्रीय समर्थन की कमी इसके रास्ते में बड़ी चुनौती हैं। बावजूद इसके, बलूचिस्तान का मुद्दा समय-समय पर क्षेत्रीय राजनीति और वैश्विक कूटनीति में चर्चा का विषय बना रहता है।
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