CBSE के तीन-भाषा फॉर्मूले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, अगली सुनवाई अगले हफ्ते
CBSE के कक्षा 9 के तीन-भाषा अनिवार्य नियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने इसे अव्यवहारिक बताते हुए कहा कि इससे छात्रों में भ्रम पैदा होगा।
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) द्वारा लागू किए गए नए तीन-भाषा नीति को लेकर अब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। इस नीति को चुनौती देते हुए एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। याचिकाकर्ता के वकील मुकुल रोहतगी ने अदालत में कहा कि छात्रों को अचानक तीन भाषाएं सीखना और फिर कक्षा 10 की परीक्षा देना अव्यावहारिक है और इससे “अराजकता” की स्थिति पैदा होगी।
मुख्य न्यायाधीश ने इस मामले पर कहा कि “हम इस पर अगले सप्ताह सुनवाई करेंगे।”
सीबीएसई ने अपने नए नियम के तहत 1 जुलाई 2026 से कक्षा 9 के छात्रों के लिए तीन भाषाओं (आर1, आर2, आर3) का अध्ययन अनिवार्य कर दिया है। इनमें से कम से कम दो भाषाएं भारतीय मूल की होनी चाहिए। यह नियम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढांचा (NCF-SE) 2023 के अनुरूप लागू किया गया है।
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बोर्ड के अनुसार, कक्षा 10 में तीसरी भाषा की कोई बोर्ड परीक्षा नहीं होगी, लेकिन उसका अध्ययन अनिवार्य रहेगा। यह व्यवस्था धीरे-धीरे सभी कक्षाओं में लागू की जाएगी।
सीबीएसई की अधिसूचना के अनुसार, भाषाओं को तीन स्तरों—आर1, आर2 और आर3 में विभाजित किया गया है। आर1 छात्र की मुख्य भाषा होगी, आर2 दूसरी भाषा होगी और आर3 तीसरी अनिवार्य भाषा होगी, जिसे कक्षा 6 से लागू किया जाएगा और 2030-31 तक कक्षा 10 तक पूरी तरह लागू किया जाएगा।
इस फॉर्मूले के तहत छात्र दो समान भाषाएं नहीं चुन सकेंगे। हिंदी और अंग्रेजी सहित भारत की 8वीं अनुसूची की सभी भाषाएं और कई क्षेत्रीय तथा विदेशी भाषाएं भी विकल्प के रूप में उपलब्ध होंगी।
याचिकाकर्ता का कहना है कि यह नीति छात्रों पर अतिरिक्त बोझ डालती है और अचानक बदलाव से शिक्षा प्रणाली प्रभावित हो सकती है।
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