गॉड पार्टिकल के बाद अब ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्य डार्क मैटर की तलाश में सीईआरएन
हिग्स बोसॉन की खोज के बाद सीईआरएन अब डार्क मैटर का रहस्य सुलझाने की तैयारी कर रहा है। उन्नत एलएचसी से वैज्ञानिकों को नए संकेत मिलने की उम्मीद है।
‘गॉड पार्टिकल’ के नाम से मशहूर हिग्स बोसॉन की खोज के बाद दुनिया की सबसे बड़ी कण भौतिकी प्रयोगशाला सीईआरएन अब ब्रह्मांड के एक और बड़े रहस्य डार्क मैटर को समझने की दिशा में आगे बढ़ रही है। वर्ष 2012 में हिग्स बोसॉन की खोज ने कणों को द्रव्यमान मिलने की प्रक्रिया से जुड़ी दशकों पुरानी वैज्ञानिक अवधारणा की पुष्टि की थी और स्टैंडर्ड मॉडल को पूरा किया था।
सीईआरएन के महानिदेशक डॉ. मार्क थॉमसन ने कहा कि हिग्स बोसॉन अब भी वैज्ञानिकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण विषय है। उनके मुताबिक यह प्रकृति में देखे गए अन्य कणों से बिल्कुल अलग और असामान्य है। वैज्ञानिक इसके गुणों को और गहराई से समझना चाहते हैं।
इसके लिए लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर यानी एलएचसी को बड़े स्तर पर उन्नत किया जा रहा है। स्विट्जरलैंड और फ्रांस की सीमा के नीचे लगभग 27 किलोमीटर लंबी सुरंग में स्थित यह मशीन करीब 100 मीटर गहराई में काम करती है। उन्नयन के बाद इसे हाई-ल्यूमिनोसिटी लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर बनाया जाएगा, जो मौजूदा मशीन की तुलना में करीब 10 गुना अधिक डेटा जुटा सकेगा।
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डार्क मैटर इस परियोजना का प्रमुख लक्ष्य है। वैज्ञानिकों के अनुसार ब्रह्मांड का लगभग पांच प्रतिशत हिस्सा ही सामान्य पदार्थ है, जबकि करीब 27 प्रतिशत डार्क मैटर और बाकी डार्क एनर्जी मानी जाती है। डार्क मैटर प्रकाश को न उत्सर्जित करता है और न परावर्तित, इसलिए इसे सीधे देखा नहीं जा सकता। इसके अस्तित्व का अनुमान उसके गुरुत्वाकर्षण प्रभावों से लगाया जाता है।
सीईआरएन पहले भी डार्क मैटर के संकेत तलाश चुका है, लेकिन प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला। थॉमसन के अनुसार नया एलएचसी वैज्ञानिकों को कहीं अधिक डेटा उपलब्ध कराएगा।
सीईआरएन में प्रतिपदार्थ पर भी महत्वपूर्ण शोध हो रहा है। हाल में वैज्ञानिकों ने थोड़ी मात्रा में फंसे एंटीप्रोटॉन को प्रयोगशाला परिसर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने का सफल परीक्षण किया। इससे भविष्य में प्रतिपदार्थ के अधिक सटीक प्रयोग संभव हो सकते हैं।
भारत का सीईआरएन के साथ पुराना और मजबूत वैज्ञानिक सहयोग है। करीब 300 भारतीय वैज्ञानिक इसके विभिन्न प्रयोगों में योगदान दे रहे हैं। भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की तकनीकी विशेषज्ञता की सीईआरएन महानिदेशक ने भी सराहना की।
सीईआरएन परिसर में भारत की ओर से स्थापित नटराज की कांस्य प्रतिमा भी इस सहयोग का प्रतीक है। इसके अलावा भविष्य के लिए 91 किलोमीटर लंबे फ्यूचर सर्कुलर कोलाइडर की योजना पर भी काम हो रहा है। इसका उद्देश्य आने वाले दशकों में ब्रह्मांड और पदार्थ की प्रकृति से जुड़े अनसुलझे सवालों की खोज को आगे बढ़ाना है।
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