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दक्षिण अफ्रीका में नौसैनिक अभ्यास के लिए पहुंचे चीन, रूस और ईरान के युद्धपोत, वैश्विक तनाव के बीच बढ़ी हलचल

चीन, रूस और ईरान के युद्धपोत दक्षिण अफ्रीका में संयुक्त नौसैनिक अभ्यास में शामिल हुए, जिससे अमेरिका के साथ तनाव और ब्रिक्स सहयोग पर वैश्विक चर्चा तेज हो गई।

वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच चीन, रूस और ईरान के युद्धपोत दक्षिण अफ्रीका के समुद्री क्षेत्र में एक सप्ताह लंबे संयुक्त नौसैनिक अभ्यास के लिए पहुंच गए हैं। यह अभ्यास शुक्रवार (9 जनवरी, 2026) से केप टाउन के तट के पास शुरू हुआ। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका द्वारा वेनेजुएला में हस्तक्षेप और वेनेजुएलाई तेल ले जा रहे टैंकरों को जब्त करने की कार्रवाई को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव बना हुआ है।

चीन के नेतृत्व में आयोजित ये नौसैनिक अभ्यास पिछले वर्ष विकासशील देशों के समूह ब्रिक्स (BRICS) के तहत तय किए गए थे। दक्षिण अफ्रीका की सशस्त्र सेनाओं ने कहा कि इन अभ्यासों का उद्देश्य समुद्री सुरक्षा, समुद्री डकैती विरोधी अभियानों का अभ्यास करना और सदस्य देशों के बीच सहयोग को और गहरा करना है।

चीन, रूस और दक्षिण अफ्रीका लंबे समय से ब्रिक्स के सदस्य हैं, जबकि ईरान 2024 में इस समूह में शामिल हुआ था। इन अभ्यासों में ईरानी नौसेना की भागीदारी ऐसे समय हो रही है, जब ईरान में इस्लामिक रिपब्लिक के नेतृत्व के खिलाफ घरेलू स्तर पर विरोध प्रदर्शन बढ़ रहे हैं।

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यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि ब्रिक्स के अन्य सदस्य देश — जिनमें भारत, ब्राज़ील और संयुक्त अरब अमीरात भी शामिल हैं — इन अभ्यासों में भाग ले रहे हैं या नहीं। दक्षिण अफ्रीकी सशस्त्र बलों के प्रवक्ता ने कहा कि अगले शुक्रवार तक चलने वाले इन अभ्यासों में शामिल सभी देशों की अंतिम सूची की पुष्टि अभी नहीं हो सकी है।

चीन, रूस और ईरान के युद्धपोतों को केप टाउन के दक्षिण में स्थित साइमन्स टाउन बंदरगाह में आते-जाते देखा गया है, जो दक्षिण अफ्रीका का प्रमुख नौसैनिक अड्डा है। चीन की ओर से 161 मीटर लंबा ‘तांगशान’ विध्वंसक पोत भी इन अभ्यासों में शामिल है। दक्षिण अफ्रीका इससे पहले 2023 में भी चीन और रूस के साथ इसी तरह के अभ्यास आयोजित कर चुका है।

इन अभ्यासों को पहले नवंबर में होना था, लेकिन जी-20 शिखर सम्मेलन के कारण इन्हें टाल दिया गया था। माना जा रहा है कि यह घटनाक्रम अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के संबंधों में और तनाव ला सकता है, क्योंकि ट्रंप प्रशासन पहले ही ब्रिक्स देशों और विशेष रूप से ईरान व रूस के साथ दक्षिण अफ्रीका के रिश्तों को लेकर आलोचना करता रहा है।

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