समझाया गया: अमेरिका, रूस और डेनमार्क—आर्कटिक में किसके पास कितनी सैन्य ताकत
आर्कटिक क्षेत्र में अमेरिका, रूस और नाटो देशों की मजबूत सैन्य मौजूदगी है, जहां परमाणु ठिकाने, नौसेनाएं और वायु अड्डे वैश्विक सुरक्षा संतुलन को प्रभावित करते हैं।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा जताई है। उनका कहना है कि अमेरिका की सुरक्षा सुनिश्चित करने का यही एकमात्र तरीका है। हालांकि, डेनमार्क और उसके स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड ने इस प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा है कि वॉशिंगटन की किसी भी सुरक्षा चिंता का समाधान मौजूदा रक्षा समझौते के तहत किया जा सकता है।
आर्कटिक क्षेत्र में आठ देशों की भौगोलिक उपस्थिति है—रूस, अमेरिका, कनाडा, डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड और आइसलैंड। इस क्षेत्र में सैन्य तैनाती और रणनीतिक संपत्तियां तेजी से अहम होती जा रही हैं।
रूस:
आर्कटिक की आधी भूमि रूस के अधीन है। 2005 के बाद से मॉस्को ने सोवियत काल के दर्जनों सैन्य ठिकानों को फिर से सक्रिय और आधुनिक बनाया है। नोवाया ज़ेमल्या में रूस का परमाणु परीक्षण स्थल उच्च सतर्कता पर है। कोला प्रायद्वीप रूस की परमाणु प्रतिआक्रमण क्षमता का बड़ा हिस्सा समेटे हुए है और यहीं उसकी नॉर्दर्न फ्लीट तैनात है, जिसमें परमाणु-सशस्त्र पनडुब्बियां शामिल हैं।
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अमेरिका और कनाडा:
1957 से दोनों देश नोराड (NORAD) के जरिए संयुक्त रक्षा करते हैं। अमेरिका ग्रीनलैंड में पिटुफिक स्पेस बेस संचालित करता है और अलास्का में उसके आठ सैन्य अड्डे हैं। कनाडा के पास आर्कटिक में पांच ठिकाने हैं, जिनमें दुनिया की सबसे उत्तरी बस्ती ‘अलर्ट’ शामिल है।
डेनमार्क:
डेनमार्क का जॉइंट आर्कटिक कमांड ग्रीनलैंड की राजधानी नूक में स्थित है। इसके पास सीमित लेकिन रणनीतिक सैन्य तैनाती है, जिसमें प्रसिद्ध सिरीयस डॉग स्लेज पेट्रोल भी शामिल है।
स्वीडन और फिनलैंड:
दोनों देशों के उत्तरी हिस्सों में वायुसेना और थलसेना के अड्डे हैं। नाटो में शामिल होने के बाद ये देश गठबंधन के साथ सैन्य एकीकरण बढ़ा रहे हैं।
नॉर्वे और आइसलैंड:
नॉर्वे आर्कटिक और उत्तरी अटलांटिक में नाटो की निगरानी करता है, जबकि आइसलैंड के पास स्थायी सेना नहीं है, लेकिन वहां नाटो और अमेरिकी विमानों की अस्थायी तैनाती होती रहती है।
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