अंतरिक्ष सुरक्षा पर जर्मनी का बड़ा दांव: लेज़र हथियार और जासूसी उपग्रहों में भारी निवेश की तैयारी
रूस और चीन से बढ़ते अंतरिक्ष खतरों के बीच जर्मनी सैन्य अंतरिक्ष क्षमताओं पर अरबों यूरो निवेश की योजना बना रहा है, जिसमें जासूसी उपग्रह और लेज़र तकनीक शामिल हैं।
जर्मनी अंतरिक्ष में बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रहा है। देश 35 अरब यूरो की सैन्य अंतरिक्ष खर्च योजना के तहत जासूसी उपग्रहों, स्पेस प्लेन और आक्रामक लेज़र प्रणालियों में निवेश पर विचार कर रहा है। जर्मनी के अंतरिक्ष कमांडर के अनुसार, यह योजना रूस और चीन की ओर से कक्षा में बढ़ते खतरों का मुकाबला करने के उद्देश्य से तैयार की गई है।
जर्मन स्पेस कमांड के प्रमुख माइकल ट्रॉट ने बताया कि आने वाले वर्षों में जर्मनी 100 से अधिक उपग्रहों वाला एक एन्क्रिप्टेड सैन्य उपग्रह नेटवर्क विकसित करेगा, जिसे “सैटकॉम स्टेज 4” नाम दिया गया है। यह नेटवर्क अमेरिकी स्पेस डेवलपमेंट एजेंसी के मॉडल पर आधारित होगा, जो निम्न पृथ्वी कक्षा में संचार और मिसाइल ट्रैकिंग के लिए उपग्रह तैनात करती है।
इस बीच, जर्मनी की रक्षा कंपनी राइनमेटल एक जर्मन सैटेलाइट निर्माता के साथ मिलकर एक सैन्य उपग्रह परियोजना के लिए संयुक्त बोली पर बातचीत कर रही है। यह संभावित साझेदारी ऐसे समय में सामने आई है, जब यूरोप की प्रमुख अंतरिक्ष कंपनियां एयरबस, थेल्स और लियोनार्डो मिलकर एलन मस्क की स्टारलिंक सेवा के विकल्प के रूप में एक यूरोपीय उपग्रह संचार प्रणाली विकसित करने की कोशिश कर रही हैं।
ट्रॉट के अनुसार, वर्ष 2022 में यूक्रेन पर रूस के पूर्ण पैमाने पर आक्रमण के बाद से अंतरिक्ष क्षेत्र कहीं अधिक प्रतिस्पर्धी और संवेदनशील हो गया है। उन्होंने कहा कि जर्मनी और उसके यूरोपीय सहयोगियों को केवल सुरक्षित संचार ही नहीं, बल्कि ऐसी क्षमताओं में भी निवेश करना होगा जो दुश्मन के अंतरिक्ष प्रणालियों को बाधित या निष्क्रिय कर सकें।
जर्मनी खुफिया जानकारी जुटाने वाले उपग्रहों, उन्नत सेंसर और विरोधी उपग्रहों को बाधित करने वाली प्रणालियों पर धन खर्च करेगा। इनमें लेज़र तकनीक और जमीनी बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने वाले उपकरण भी शामिल होंगे। हालांकि, जर्मनी कक्षा में ऐसे विनाशकारी हथियार तैनात नहीं करेगा जो अंतरिक्ष मलबा पैदा करें। इसके बजाय, जैमिंग, लेज़र और ग्राउंड कंट्रोल स्टेशनों के खिलाफ कार्रवाई जैसे गैर-घातक विकल्पों को प्राथमिकता दी जाएगी।
इसके साथ ही तथाकथित “इंस्पेक्टर सैटेलाइट्स” पर भी ध्यान दिया जा रहा है, जो अन्य उपग्रहों के बेहद करीब जाकर संचालन कर सकते हैं। ट्रॉट ने चेतावनी दी कि रूस और चीन पहले ही इस तरह की तकनीक तैनात कर चुके हैं, जिससे अंतरिक्ष अब एक सक्रिय सैन्य क्षेत्र बनता जा रहा है।
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