गुरिल्ला ओपन एक्सेस आंदोलन: कैसे एरन स्वार्ट्ज़ ने पाइरेसी पर सोच बदल दी
गुरिल्ला ओपन एक्सेस आंदोलन के जरिए एरन स्वार्ट्ज़ ने ज्ञान की मुक्त पहुंच की वकालत की और सूचना, पाइरेसी व डिजिटल अधिकारों पर वैश्विक बहस को नई दिशा दी।
अमेरिकी तकनीकी विशेषज्ञ एरन स्वार्ट्ज़ उन चुनिंदा लोगों में शामिल थे, जिन्होंने इंटरनेट की दुनिया को वैसा रूप दिया, जैसा हम आज देखते हैं। बेहद कम उम्र में उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन उनके विचार और योगदान आज भी डिजिटल दुनिया में बहस और प्रेरणा का विषय बने हुए हैं। एरन स्वार्ट्ज़ को “गुरिल्ला ओपन एक्सेस आंदोलन” के विचारक के रूप में विशेष रूप से जाना जाता है, जिसने सूचना, ज्ञान और पाइरेसी को देखने के नजरिए को बदल दिया।
साल 2008 में प्रकाशित गुरिल्ला ओपन एक्सेस मेनिफेस्टो में स्वार्ट्ज़ ने लिखा था कि जानकारी चाहे कहीं भी संग्रहीत हो, उसे हासिल करना, उसकी प्रतियां बनाना और पूरी दुनिया के साथ साझा करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि जो सामग्री कॉपीराइट से मुक्त है, उसे डिजिटल आर्काइव में जोड़ा जाना चाहिए। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी लिखा कि गुप्त और महंगे डेटाबेस को खरीदकर वेब पर सार्वजनिक किया जाना चाहिए, वैज्ञानिक जर्नल डाउनलोड कर फाइल-शेयरिंग नेटवर्क पर अपलोड किए जाने चाहिए और सूचना तक मुक्त पहुंच के लिए हरसंभव संघर्ष किया जाना चाहिए।
यह घोषणापत्र महज दो पन्नों का था, लेकिन इसके विचारों ने पूरी दुनिया में बहस छेड़ दी। स्वार्ट्ज़ का मानना था कि ज्ञान पर कुछ चुनिंदा संस्थानों और कॉर्पोरेट प्रकाशकों का नियंत्रण अन्यायपूर्ण है। उन्होंने अकादमिक प्रकाशकों और सूचना डेटाबेस तक आम लोगों की पहुंच को सार्वजनिक भलाई का सवाल बताया।
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हालांकि, उनके विचारों को लेकर विवाद भी रहा। आलोचकों का कहना था कि कानूनी और अवैध दोनों तरीकों की वकालत करना कानून के शासन को कमजोर करता है। वहीं समर्थकों ने इसे सूचना की आज़ादी और डिजिटल समानता की लड़ाई बताया।
एरन स्वार्ट्ज़ की विरासत आज भी ओपन एक्सेस, डिजिटल अधिकारों और ज्ञान की स्वतंत्रता से जुड़ी बहसों में जीवित है। उन्होंने यह सवाल छोड़ दिया कि क्या ज्ञान को मुनाफे की वस्तु बनाया जाना चाहिए या इसे मानवता की साझा धरोहर के रूप में देखा जाना चाहिए।