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ज्ञानवापी विवाद में मध्यस्थता से दोनों पक्षों का इनकार, हिंदू और मुस्लिम पक्ष बोले- अदालत ही करे अंतिम फैसला

ज्ञानवापी विवाद में हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों ने उच्चतम न्यायालय की मध्यस्थता पहल ठुकरा दी। दोनों ने कहा कि मामले का समाधान केवल न्यायिक प्रक्रिया से होना चाहिए।

वाराणसी स्थित ज्ञानवापी मस्जिद और काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़े बहुचर्चित विवाद में हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों ने उच्चतम न्यायालय की मध्यस्थता (मेडिएशन) की पहल को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। दोनों पक्षों का कहना है कि इस धार्मिक विवाद का समाधान अदालत के फैसले से ही होना चाहिए, न कि अदालत के बाहर आपसी समझौते के जरिए।

उच्चतम न्यायालय ने लंबित मामलों के सौहार्दपूर्ण समाधान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 'सुप्रीम कोर्ट एक्शन फॉर मेडिएटेड एडजुडिकेशन एंड डिस्प्यूट्स हार्मोनाइजेशन अक्रॉस नेशन (समाधान समारोह)' पहल शुरू की है। इसी अभियान के तहत 21, 22 और 23 अगस्त को आयोजित होने वाली विशेष लोक अदालत से पहले विभिन्न मामलों के पक्षकारों को मध्यस्थता की संभावना तलाशने के लिए कहा गया था। इसी क्रम में ज्ञानवापी मामले के दोनों पक्षों को मंगलवार को वाराणसी की मध्यस्थता केंद्र में उपस्थित होने का सुझाव दिया गया था।

हालांकि, हिंदू पक्ष ने स्पष्ट किया कि वह इस विवाद का निपटारा केवल कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से चाहता है। हिंदू पक्ष के अधिवक्ता मदन मोहन यादव ने कहा कि उनका मानना है कि विवादित स्थल मूल रूप से मंदिर का है और इस पर अदालत के फैसले के आधार पर ही निर्णय होना चाहिए। उन्होंने कहा कि उनका पक्ष काशी विश्वनाथ के मूल ज्योतिर्लिंग स्थल पर भव्य मंदिर निर्माण की मांग करता है।

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वहीं, अंजुमन इंतजामिया मस्जिद समिति के सचिव मोहम्मद यासीन ने भी मध्यस्थता प्रक्रिया में शामिल होने से इनकार कर दिया। उनका कहना है कि इस मामले का समाधान बातचीत से संभव नहीं है और न्यायालय का निर्णय ही अंतिम होना चाहिए।

ज्ञानवापी विवाद वाराणसी में स्थित ज्ञानवापी मस्जिद की धार्मिक स्थिति से जुड़ा दीवानी मामला है। हिंदू पक्ष का दावा है कि 17वीं शताब्दी में मुगल शासक औरंगज़ेब के शासनकाल में प्राचीन मंदिर के अवशेषों पर मस्जिद का निर्माण कराया गया था। वहीं, मुस्लिम पक्ष का कहना है कि मस्जिद एक वैध वक्फ संपत्ति है और उसका कानूनी दर्जा बरकरार है।

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