ईरान संकट में मध्यस्थता को लेकर भारत-पाक तुलना पर बोले राजदूत, कहा—भीड़भाड़ वाले हालात में फायदा नहीं
भारत के राजदूत विक्रम दोरईस्वामी ने कहा कि ईरान संकट में मध्यस्थता करना भारत के लिए लाभकारी नहीं होगा और भीड़भाड़ वाले हालात में पाकिस्तान जैसी भूमिका की जरूरत नहीं है।
चीन में भारत के राजदूत विक्रम दोरईस्वामी ने ईरान संकट को लेकर भारत और पाकिस्तान की भूमिका की तुलना को खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि मौजूदा स्थिति में मध्यस्थता करना भारत के लिए किसी विशेष लाभ का कारण नहीं बनता।
यह बयान उन्होंने बीजिंग में आयोजित वर्ल्ड पीस फोरम के दौरान दिया, जो त्सिंगहुआ विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित एक वार्षिक विदेश नीति कार्यक्रम है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि प्रत्येक देश को यह तय करना होता है कि किसी अंतरराष्ट्रीय विवाद में मध्यस्थता करना उसके राष्ट्रीय हित में कितना उपयोगी है।
राजदूत दोरईस्वामी ने कहा, “मध्यस्थता का सवाल हर देश को अपने राष्ट्रीय हित के आधार पर तय करना होता है। हमने अतीत में अपनी भूमिका निभाई है, लेकिन इस समय, जब हालात पहले से ही बहुत अधिक जटिल और भीड़भाड़ वाले हैं, तब इसमें कूदना भारत के लिए किसी विशेष लाभ का कारण नहीं होगा।”
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उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान संकट में पहले से ही कई देश सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, ऐसे में अतिरिक्त हस्तक्षेप भारत की रणनीतिक स्थिति को मजबूत नहीं करेगा।
यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब हाल ही में पाकिस्तान की ओर से ईरान संकट में मध्यस्थता की कोशिशों को लेकर चर्चा तेज हुई है। इसी संदर्भ में भारत की वैश्विक भूमिका और नेतृत्व की संभावनाओं पर भी सवाल उठ रहे थे।
दोरईस्वामी ने कहा कि भारत पहले भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शांति और संवाद को बढ़ावा देने में योगदान देता रहा है, लेकिन हर स्थिति में मध्यस्थता करना आवश्यक नहीं होता।
उन्होंने जोर देकर कहा कि विदेश नीति का उद्देश्य देश के दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखना है, न कि केवल प्रतीकात्मक भूमिका निभाना।