176 मामलों, स्टॉक गवाहों और इंदौर के एक थाने की कहानी
इंदौर पुलिस पर ‘स्टॉक गवाहों’ के इस्तेमाल का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने चंदन नगर थाने के एसएचओ को पुलिस लाइन भेजने और जांच से दूर रखने का आदेश दिया।
176 मामलों, बार-बार इस्तेमाल किए गए गवाहों और इंदौर के एक पुलिस थाने को लेकर उठा मामला हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और निर्देश के केंद्र में रहा है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में इंदौर का चंदन नगर थाना और उसके थाना प्रभारी (एसएचओ) निरीक्षक इंद्रमणि पटेल हैं।
13 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति अहसनुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने निर्देश दिया कि निरीक्षक इंद्रमणि पटेल को तत्काल पुलिस लाइन भेजा जाए और अगली सुनवाई तक उन्हें किसी भी प्रकार की जांच या पर्यवेक्षण की भूमिका से दूर रखा जाए। यह आदेश उस आवेदन पर सुनवाई के दौरान दिया गया, जिसमें पटेल की टीम द्वारा गिरफ्तार किए गए एक आरोपी की जमानत याचिका खारिज किए जाने को चुनौती दी गई थी।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इंदौर पुलिस द्वारा कथित रूप से ‘स्टॉक गवाहों’ के इस्तेमाल की गंभीरता पर सवाल उठाए। पीठ ने प्रथम दृष्टया पाया कि निरीक्षक पटेल ने कथित अपराधों में पुलिस के संस्करण का समर्थन करने के लिए बार-बार उन्हीं गवाहों का उपयोग किया या इसकी अनुमति दी। अदालत ने इस प्रथा को ‘स्टॉक गवाहों’ का उपयोग बताया।
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कोर्ट ने कहा कि इस तरह की प्रक्रिया जांच की निष्पक्षता और पारदर्शिता की जड़ पर प्रहार करती है। न्यायाधीशों ने टिप्पणी की कि कानून के शासन से संचालित देश में ऐसी प्रथा को स्वीकार नहीं किया जा सकता और यह निष्पक्ष जांच की अवधारणा के बिल्कुल विपरीत है।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी न केवल संबंधित पुलिस अधिकारी पर सवाल उठाती है, बल्कि आपराधिक जांच प्रक्रिया में गवाहों की विश्वसनीयता और पुलिस की भूमिका पर भी गंभीर बहस को जन्म देती है। अदालत ने संकेत दिया कि जब तक आगे के आदेश नहीं आते, तब तक संबंधित अधिकारी किसी भी जांच प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनेंगे।
इस मामले को पुलिस व्यवस्था में सुधार और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने की दिशा में एक अहम संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
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