केन-बेतवा लिंक परियोजना के विरोध में प्रदर्शन, जानिए क्यों चिंतित हैं आदिवासी और पर्यावरणविद
केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर मध्य प्रदेश में विरोध प्रदर्शन जारी है। आदिवासी पुनर्वास, मुआवजा और पर्यावरणीय नुकसान की आशंकाओं के कारण ग्रामीण इसका विरोध कर रहे हैं।
केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में विरोध प्रदर्शन तेज हो गया है। यह परियोजना भारत की पहली नदी जोड़ो परियोजना है, जिसकी अनुमानित लागत करीब 44 हजार करोड़ रुपये है। ग्रामीणों, खासकर आदिवासी समुदाय के लोगों का कहना है कि परियोजना से उनकी जमीन, घर और आजीविका प्रभावित होगी। वहीं पर्यावरणविद भी इसके संभावित पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर चिंता जता रहे हैं।
मामला तब सामने आया जब 19 जुलाई को मध्य प्रदेश पुलिस ने छतरपुर जिले के कुपी गांव में बराना नदी की धारा के किनारे चल रहे प्रदर्शन स्थल को खाली कराया। यहां पिछले दो सप्ताह से सैकड़ों ग्रामीण, जिनमें बड़ी संख्या में आदिवासी लोग शामिल थे, केंद्र सरकार की केन-बेतवा लिंक परियोजना और राज्य सरकार की दो सिंचाई परियोजनाओं का विरोध कर रहे थे।
पुलिस ने जय किसान संगठन के संस्थापक और स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर को भी हिरासत में लिया। अमित भटनागर पिछले 14 दिनों से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर थे। पुलिस ने उन्हें सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया। इसके अलावा करीब 150 प्रदर्शनकारियों को बसों में बैठाकर उनके गांवों तक पहुंचाया गया। इनमें अधिकतर लोग पड़ोसी पन्ना जिले के रहने वाले थे।
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केन-बेतवा परियोजना का उद्देश्य केन नदी के अतिरिक्त जल को बेतवा नदी क्षेत्र में पहुंचाकर बुंदेलखंड क्षेत्र में सिंचाई सुविधा बढ़ाना और जल संकट को कम करना है। परियोजना से मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों को लाभ मिलने का दावा किया जा रहा है।
हालांकि, स्थानीय लोगों की चिंता है कि परियोजना के कारण कई गांव प्रभावित होंगे और बड़ी संख्या में परिवारों को विस्थापित होना पड़ सकता है। आदिवासी समुदाय पुनर्वास व्यवस्था, उचित मुआवजा और अपनी पारंपरिक जमीन तथा आजीविका बचाने की मांग कर रहा है।
पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों का कहना है कि परियोजना से पन्ना टाइगर रिजर्व जैसे महत्वपूर्ण वन क्षेत्र पर असर पड़ सकता है। उनका तर्क है कि जंगलों की कटाई, वन्यजीवों के आवास में बदलाव और जैव विविधता को नुकसान जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
सरकार जहां इसे क्षेत्र के विकास और जल प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण परियोजना बता रही है, वहीं प्रभावित ग्रामीण और पर्यावरणविद इसके सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
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