इबोला के नए प्रकोप ने उजागर की वैक्सीन रिसर्च की कमजोरी, संसाधनों की कमी बनी बड़ी चुनौती
कांगो और युगांडा में फैले नए इबोला प्रकोप ने वैक्सीन अनुसंधान की वैश्विक कमजोरी उजागर कर दी है। बुनियादी ढांचे और फंडिंग की कमी से हालात गंभीर बने हुए हैं।
डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और युगांडा में फैले बुंडिबुग्यो इबोलावायरस (बीडीबीवी) के नए प्रकोप ने वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर कमजोरियों को उजागर कर दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 17 मई को इस प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया था। विशेषज्ञों का कहना है कि यह संकट केवल बीमारी का नहीं, बल्कि वैक्सीन अनुसंधान और स्वास्थ्य ढांचे की विफलता का भी संकेत है।
रिपोर्ट के अनुसार, बुंडिबुग्यो प्रजाति के इबोलावायरस के लिए अब तक कोई लाइसेंस प्राप्त वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। इसका प्रमुख कारण वैक्सीन विकसित करने के लिए पर्याप्त संसाधनों और निवेश की कमी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि उपेक्षित उष्णकटिबंधीय बीमारियों पर वैश्विक स्तर पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता, क्योंकि इन बीमारियों से प्रभावित क्षेत्र आर्थिक रूप से कमजोर और सीमांत माने जाते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अफ्रीकी देशों में स्वास्थ्य ढांचा पहले से ही कमजोर है और वहां अनुसंधान, परीक्षण और चिकित्सा सुविधाओं की भारी कमी है। ऐसे में इबोला जैसे घातक वायरस का प्रकोप तेजी से फैलने का खतरा बढ़ जाता है। वैक्सीन अनुसंधान में देरी का सबसे बड़ा कारण यह है कि दवा कंपनियां उन बीमारियों पर अधिक निवेश करती हैं जिनसे उन्हें आर्थिक लाभ मिलने की संभावना होती है।
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डब्ल्यूएचओ और अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां अब प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी, इलाज और संक्रमण रोकने के प्रयास तेज कर रही हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि केवल आपातकालीन कदम पर्याप्त नहीं होंगे। भविष्य में ऐसे प्रकोपों से निपटने के लिए गरीब और विकासशील देशों की स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करना तथा वैक्सीन अनुसंधान में दीर्घकालिक निवेश बेहद जरूरी है।
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