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क्या पाकिस्तान पेपर पर शांति दूत है? रिपोर्ट ने ईरान युद्ध विराम में मध्यस्थ की भूमिका पर उठाए सवाल

पाकिस्तान ने खुद को शांति दूत के रूप में पेश किया, लेकिन रिपोर्टों में यह सामने आया कि पाकिस्तान ने केवल अमेरिकी दबाव के तहत समझौता किया, और खुद कोई ठोस कदम नहीं उठाया।

पाकिस्तान ने खुद को अमेरिका-ईरान युद्ध विराम के लिए शांति दूत के रूप में प्रस्तुत किया है, लेकिन एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान ने इस समझौते के लिए अमेरिकी दबाव में काम किया और खुद से इस युद्ध को रोकने के लिए कोई बड़ा कदम नहीं उठाया।

पाकिस्तान अपने मीडिया में इसे शांति के प्रयास के रूप में पेश कर रहा है और यहां तक कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को नोबेल शांति पुरस्कार देने की बात कर रहा है। हालांकि, असलियत कुछ और ही है, जैसा कि हालिया रिपोर्ट में सामने आया है।

रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान को अमेरिका ने ईरान से युद्ध विराम करवााने के लिए दबाव डाला था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ कड़ी बयानबाजी की थी और एक समय तो उन्होंने ईरान को युद्ध विराम के लिए "भीख" मांगने वाला कहा था।

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रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने पाकिस्तान को एक मुस्लिम बहुल देश के रूप में चुना, ताकि ईरान शांति समझौते को आसानी से स्वीकार कर सके। पाकिस्तान के मीडिया में दावा किया गया कि उसकी कूटनीतिक भूमिका के कारण एक संभावित युद्ध से बचा जा सका और इस योगदान के लिए पाकिस्तान को नोबेल शांति पुरस्कार मिलना चाहिए।

हालांकि, रिपोर्ट इसके विपरीत बताती है, यह बताते हुए कि पाकिस्तान केवल एक चैनल था और कोई ठोस प्रयास नहीं किया।

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