स्विट्जरलैंड के ग्लेशियरों ने पांच साल में खोई 20% बर्फ, दुनिया पर क्या होगा असर?
स्विट्जरलैंड के ग्लेशियरों ने पांच वर्षों में करीब 20 प्रतिशत बर्फ खोई है। कम बर्फबारी और रिकॉर्ड गर्मी से बढ़ता पिघलाव जलस्रोत, कृषि, बिजली और पर्वतीय सुरक्षा प्रभावित कर सकता है।
यूरोप में बढ़ती गर्मी का गंभीर असर स्विट्जरलैंड के ग्लेशियरों पर पड़ रहा है। एक नए अध्ययन के अनुसार, स्विट्जरलैंड ने केवल पांच वर्षों में अपनी करीब 20 प्रतिशत बर्फ खो दी है। स्विस ग्लेशियर मॉनिटरिंग संस्था ग्लामोस के अनुसार, कुछ ग्लेशियरों में बर्फ पिघलने की रफ्तार इतनी तेज रही कि 2022 के रिकॉर्ड नुकसान के आंकड़े भी पीछे छूट गए।
ग्लामोस के प्रमुख और ग्लेशियोलॉजिस्ट मैथियास हुस ने कहा कि उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है जैसे ग्लेशियर उनकी आंखों के सामने गायब हो रहे हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, 2026 के शुरुआती आठ महीनों में कुछ ग्लेशियरों की बर्फीली जीभ करीब 10 मीटर तक पतली हो गई।
2026 में क्यों बढ़ा बर्फ पिघलना?
स्विट्जरलैंड में इस साल सर्दियों के दौरान बर्फबारी सामान्य से काफी कम रही। इसके कारण आल्प्स के ग्लेशियरों को सूर्य की किरणों से बचाने वाली बर्फ की परत कमजोर रही। इसके बाद अप्रैल से सितंबर के बीच रिकॉर्ड गर्म और शुष्क मौसम ने स्थिति और गंभीर कर दी। लंबे समय तक 4,000 मीटर से ऊपर भी हिमांक स्तर रहने के कारण ऊंचाई वाले ग्लेशियरों में भी पिघलाव हुआ।
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ग्लेशियर केवल बर्फ के विशाल भंडार नहीं हैं। वे प्राकृतिक जलाशय की तरह काम करते हैं और गर्मी तथा कम बारिश के दौरान पिघलकर पानी उपलब्ध कराते हैं। इनके तेजी से सिकुड़ने से जल उपलब्धता, कृषि और जलविद्युत उत्पादन प्रभावित हो सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन और बाढ़ का खतरा भी बढ़ सकता है।
हिमालय पर भी असर
ग्लेशियरों का पीछे हटना केवल यूरोप तक सीमित नहीं है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार, 2025 में लगातार चौथे वर्ष सभी प्रमुख हिमनद क्षेत्रों में बर्फ का नुकसान दर्ज किया गया। हिमालय में 1990 से 2020 के बीच ग्लेशियरों का क्षेत्रफल करीब 12 प्रतिशत और अनुमानित बर्फ भंडार लगभग 9 प्रतिशत घटा।
स्विट्जरलैंड को यूरोप का ‘वॉटर टावर’ कहा जाता है। यहां से डेन्यूब, पो और राइन जैसी महत्वपूर्ण नदियों को पानी मिलता है। देश की आधे से अधिक बिजली जलविद्युत से आती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि कार्बन उत्सर्जन में कमी लाकर जलवायु परिवर्तन को धीमा करना ग्लेशियरों के संरक्षण के लिए जरूरी है।
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