लाल मांस को हरी झंडी, चीनी से दूरी: ट्रंप प्रशासन की नई स्वास्थ्य गाइडलाइंस
ट्रंप प्रशासन की नई पोषण गाइडलाइंस में प्रोसेस्ड फूड और चीनी से बचने, जबकि लाल मांस और फुल-फैट डेयरी के सेवन को बढ़ावा देने की सिफारिश की गई है।
अमेरिका में ट्रंप प्रशासन ने नई संघीय पोषण संबंधी गाइडलाइंस जारी करते हुए लोगों से अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों और अतिरिक्त चीनी से बचने की अपील की है, वहीं लाल मांस और फुल-फैट डेयरी उत्पादों के सेवन को प्रोत्साहित किया है। यह बदलाव पहले की उन सिफारिशों से अलग है, जिनमें पोषण विशेषज्ञ आमतौर पर लाल मांस और अधिक वसा वाले दुग्ध उत्पादों से दूरी बनाने की सलाह देते थे।
नई गाइडलाइंस में प्रोटीन पर पहले से ज्यादा जोर दिया गया है। इसके तहत एक “उलटी खाद्य पिरामिड” (फ्लिप्ड पिरामिड) जारी किया गया है, जिसमें मांस, डेयरी और हेल्दी फैट्स को सब्जियों और फलों के समान स्तर पर रखा गया है, जबकि फाइबर युक्त साबुत अनाज जैसे ओट्स को सबसे निचले सिरे पर दर्शाया गया है।
पोषण विशेषज्ञों और सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रियाएं मिली-जुली रही हैं। चीनी और प्रोसेस्ड फूड कम करने की सलाह को सकारात्मक बताया गया, लेकिन पशु-आधारित प्रोटीन और फुल-फैट डेयरी पर जोर को “विरोधाभासी” करार दिया गया। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी की पोषण विशेषज्ञ मैरियन नेस्ले ने इसे “भ्रमित करने वाला, वैचारिक और पुराने जमाने का” बताया।
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अमेरिकी स्वास्थ्य प्रमुख रॉबर्ट एफ. कैनेडी जूनियर ने कहा कि ये गाइडलाइंस अमेरिकी खानपान को “क्रांतिकारी रूप से बदलेंगी” और “मेक अमेरिका हेल्दी अगेन” अभियान को आगे बढ़ाएंगी। नई सिफारिशों में कहा गया है कि बच्चों को 10 साल की उम्र तक अतिरिक्त चीनी से पूरी तरह दूर रहना चाहिए और शुगर-युक्त पेय पदार्थ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं।
गाइडलाइंस में सफेद ब्रेड जैसे रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट कम करने और पैकेज्ड भोजन की जगह ताजे फल-सब्जियों को प्राथमिकता देने की सलाह दी गई है। हालांकि, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि लाल मांस और संतृप्त वसा का ज्यादा सेवन हृदय रोग और स्ट्रोक का खतरा बढ़ा सकता है।
नई गाइडलाइंस के अनुसार, अमेरिकियों को प्रति किलोग्राम शरीर भार पर 1.2 से 1.6 ग्राम प्रोटीन लेने की सलाह दी गई है, जो पहले की सिफारिशों से कहीं अधिक है। शराब को लेकर गाइडलाइंस अस्पष्ट हैं, केवल “कम सेवन” की बात कही गई है। बढ़ती खाद्य कीमतों के बीच इन सिफारिशों को लागू करना कितना व्यावहारिक होगा, इस पर भी सवाल उठ रहे हैं।
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