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नए साल पर शी जिनपिंग करेंगे दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली की मेजबानी, जापान से तनाव के बीच बीजिंग का कूटनीतिक कदम

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग नए साल पर दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली की मेजबानी करेंगे। जापान-ताइवान तनाव के बीच यह दौरा चीन–दक्षिण कोरिया संबंध मजबूत करने की रणनीति माना जा रहा है।

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग रविवार (4 जनवरी 2026) से शुरू हो रहे राजकीय दौरे पर दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्युंग की मेजबानी करेंगे। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब ताइवान को लेकर जापान के साथ चीन के संबंध हाल के वर्षों में सबसे अधिक तनावपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं। विश्लेषकों के अनुसार, यह मुलाकात बीजिंग की सियोल के साथ संबंध मजबूत करने की रणनीति को दर्शाती है।

यह पिछले दो महीनों में शी और ली की दूसरी मुलाकात होगी, जो असामान्य रूप से कम अंतराल माना जा रहा है। इससे संकेत मिलता है कि चीन दक्षिण कोरिया के साथ राजनीतिक, आर्थिक सहयोग और पर्यटन बढ़ाने को लेकर गंभीर है। राष्ट्रपति ली इस दौरान कोरियाई प्रायद्वीप में शांति के लिए चीन की भूमिका पर भी चर्चा करेंगे, ऐसा उनके राष्ट्रपति सलाहकार वी सुंग-लैक ने बताया।

चीन और जापान के रिश्तों में हालिया तल्खी तब और बढ़ गई, जब जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची ने नवंबर में यह बयान दिया कि यदि चीन ताइवान पर हमला करता है तो टोक्यो सैन्य प्रतिक्रिया दे सकता है। इसी पृष्ठभूमि में शी जिनपिंग द्वारा ली को जापान यात्रा से पहले चीन बुलाना एक सोची-समझी कूटनीतिक पहल मानी जा रही है।

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विशेषज्ञों का कहना है कि ली प्रशासन बीजिंग के साथ संबंधों को “पुनर्स्थापित” करना चाहता है, क्योंकि चीन दक्षिण कोरिया का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। पूर्व राष्ट्रपति यून सुक योल के कार्यकाल में अमेरिका और जापान के करीब जाने तथा ताइवान मुद्दे पर चीन की आलोचना के कारण दोनों देशों के रिश्ते तनावपूर्ण हो गए थे।

अब सियोल संतुलन की नीति अपनाते हुए चीन के साथ सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, ताकि क्षेत्रीय तनावों में फंसने से बचा जा सके। राष्ट्रपति ली पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि वह चीन और जापान के विवाद में किसी एक का पक्ष नहीं लेंगे।

इस दौरे में उत्तर कोरिया, अमेरिका-दक्षिण कोरिया गठबंधन, आपूर्ति श्रृंखला, दुर्लभ खनिज, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर उद्योग और के-पॉप जैसे सांस्कृतिक मुद्दों पर भी चर्चा होने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह यात्रा पूर्वी एशिया की भू-राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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