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केरल में मिट्टी के तेल की किल्लत: घटता केंद्रीय कोटा और बढ़ती कीमतों से मछुआरे और राशन कार्डधारक परेशान

केंद्र सरकार से मिलने वाले कोटे में लगातार कटौती और बढ़ती कीमतों के कारण केरल के पारंपरिक मछुआरों और राशन कार्डधारकों के लिए मिट्टी का तेल हासिल करना मुश्किल होता जा रहा है।

केरल में मिट्टी के तेल की उपलब्धता को लेकर संकट गहराता जा रहा है। राज्य के पारंपरिक मछुआरे और सार्वजनिक वितरण प्रणाली से जुड़े राशन कार्डधारक इस ईंधन की बढ़ती कीमतों और घटते केंद्रीय आवंटन से बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। यह स्थिति न केवल आम उपभोक्ताओं बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका के लिए भी बड़ी चुनौती बनती जा रही है। केरल की तटीय अर्थव्यवस्था में पारंपरिक मछली पकड़ने वाली नौकाओं का महत्वपूर्ण स्थान है, और इन नौकाओं के इंजन चलाने के लिए मिट्टी के तेल की जरूरत पड़ती है। बीते कुछ वर्षों में केंद्र सरकार की ओर से राज्य को मिलने वाले मिट्टी के तेल के कोटे में लगातार कमी की गई है, जिसके चलते मछुआरा समुदाय को अपनी नावें चलाने के लिए जरूरी ईंधन जुटाना कठिन होता जा रहा है। इसके साथ ही मिट्टी के तेल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी ने भी इस समस्या को और विकट बना दिया है। दूसरी ओर, राशन कार्ड के माध्यम से सार्वजनिक वितरण प्रणाली से सस्ती दरों पर मिट्टी का तेल पाने वाले गरीब और निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार भी इस कमी का खामियाजा भुगत रहे हैं। जिन घरों में अब भी खाना पकाने या रोशनी के लिए मिट्टी के तेल पर निर्भरता है, उनके लिए यह स्थिति आर्थिक दबाव पैदा कर रही है। आपूर्ति में कटौती के कारण कई बार परिवारों को पूरा हिस्सा भी नहीं मिल पाता, जिससे उन्हें अधिक दाम पर खुले बाजार से ईंधन खरीदने पर मजबूर होना पड़ता है। इस पूरे मसले से जुड़ा एक अहम पहलू स्वच्छ ईंधन की ओर संक्रमण की चुनौती भी है। सरकारें और नीति-निर्माता लंबे समय से पारंपरिक ईंधनों से हटकर एलपीजी और अन्य स्वच्छ विकल्पों को अपनाने पर जोर देते रहे हैं, लेकिन मछुआरा समुदाय और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए यह बदलाव आसान नहीं है। नावों के इंजन को नए ईंधन के अनुकूल बनाने में आने वाली तकनीकी और आर्थिक बाधाएं, साथ ही वैकल्पिक ईंधन ढांचे की कमी, इस संक्रमण को धीमा कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर केंद्र सरकार आवंटन में कटौती जारी रखती है और वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर समुचित ध्यान नहीं दिया जाता, तो राज्य के तटीय समुदायों की आजीविका पर गंभीर असर पड़ सकता है। इस संकट से निपटने के लिए राज्य सरकार और केंद्र के बीच समन्वय बढ़ाने के साथ-साथ मछुआरों को स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की ओर सुगमता से ले जाने वाली ठोस नीति तैयार करने की आवश्यकता जताई जा रही है। फिलहाल, मिट्टी के तेल की यह किल्लत केरल के तटीय और ग्रामीण इलाकों में जीवनयापन को प्रभावित करने वाला एक गंभीर मुद्दा बनकर उभरी है।

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