अजित पवार: उतार-चढ़ाव, बगावतों और विवादों से भरा लंबा राजनीतिक सफर
अजित पवार का राजनीतिक जीवन संघर्ष, बगावत और विवादों से भरा रहा। उनके अचानक निधन से बारामती और महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा शून्य पैदा हो गया है।
बारामती आज अपने सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक को खोने के शोक में डूबी हुई है। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का अचानक और दुखद निधन 28 जनवरी 2026 को हो गया। उनके जाने से न केवल बारामती, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति में भी एक बड़ा खालीपन पैदा हो गया है। पवार परिवार के राजनीतिक गढ़ माने जाने वाले बारामती में अजित पवार एक मजबूत स्तंभ थे, जिनका राजनीतिक जीवन नाटकीय घटनाओं, बगावतों और विवादों से भरा रहा।
अजित पवार का राजनीतिक सफर आसान नहीं रहा। उन्हें कई बार अपने ही परिवार के भीतर उपेक्षित और गलत समझे जाने का एहसास हुआ। अपने चाचा और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के संस्थापक शरद पवार के साये में रहते हुए उन्होंने लगातार अपनी राजनीतिक पहचान और पकड़ बनाए रखने के लिए संघर्ष किया। सत्ता और संगठन में अपनी भूमिका को लेकर उनके फैसले अक्सर चर्चा और विवाद का विषय बने।
बारामती, जो उनकी कर्मभूमि रही, ने उन्हें लगातार आठ बार विधानसभा भेजा। यह अपने आप में उनकी मजबूत जनाधार और राजनीतिक कौशल का प्रमाण है। वर्ष 2023 में एनसीपी के ऊर्ध्वाधर विभाजन के बाद, अजित पवार ने अपने ही चाचा शरद पवार के खिलाफ चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। यह मुकाबला न केवल राजनीतिक दृष्टि से, बल्कि पारिवारिक स्तर पर भी बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक माना गया।
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उनका राजनीतिक जीवन कई बार नाटकीय मोड़ों से गुजरा—चाहे वह सत्ता में अचानक समर्थन बदलना हो, विद्रोह करना हो या फिर विभिन्न घोटालों और आरोपों से घिरना। इसके बावजूद, अजित पवार को एक कुशल प्रशासक और जमीनी राजनीति से जुड़े नेता के रूप में भी देखा जाता रहा।
उनके असामयिक निधन के बाद एनसीपी के भविष्य को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। यह माना जा रहा है कि पार्टी एक बार फिर उथल-पुथल के दौर में जा सकती है और पवार परिवार के पुनर्मिलन की चर्चाएं भी जोर पकड़ सकती हैं। अजित पवार का जाना महाराष्ट्र की राजनीति में एक युग के अंत जैसा माना जा रहा है।