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लिव-इन रिश्तों की अवधारणा के बिना बने थे महिलाओं के पक्ष में कानून: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिव-इन पार्टनर से जुड़े बलात्कार मामले में सजा रद्द करते हुए कहा कि महिलाओं के पक्ष में बने कानून लिव-इन रिश्तों की अवधारणा से पहले के हैं।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने लिव-इन पार्टनर के साथ कथित अपहरण और बलात्कार के एक मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति की सजा को रद्द करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि महिलाओं के पक्ष में बनाए गए कई कानून उस समय अस्तित्व में आए थे, जब लिव-इन रिश्तों की अवधारणा समाज में मौजूद नहीं थी।

न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में अक्सर देखा जाता है कि जब सहमति से बने संबंध विफल हो जाते हैं, तो पुरुषों और लड़कों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हो जाती है और उन्हें दोषी ठहरा दिया जाता है। अदालत के अनुसार, इस तरह के मामलों में कानूनों के दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

यह टिप्पणी अदालत ने महाराजगंज जिले की विशेष अदालत (पॉक्सो एक्ट) द्वारा 6 मार्च 2024 को दिए गए आदेश के खिलाफ दायर एक आपराधिक अपील पर सुनवाई के दौरान की। यह मामला अगस्त 2021 में दर्ज किया गया था।

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उच्च न्यायालय ने पाया कि कथित पीड़िता घटना के समय बालिग थी और उसने आरोपी के साथ सहमति से लिव-इन संबंध में रहना स्वीकार किया था। इस आधार पर अदालत ने अपहरण, शादी के लिए बहला-फुसलाकर ले जाने और बलात्कार जैसे आरोपों में दी गई सजा को निरस्त कर दिया।

इस मामले में आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 323 (मारपीट), 363 और 366 (अपहरण व विवाह के उद्देश्य से ले जाना), 376 (बलात्कार), 506 (आपराधिक धमकी), पॉक्सो एक्ट की धारा 6 और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(V) के तहत आरोप लगाए गए थे।

अदालत ने कहा कि बदलते सामाजिक संदर्भों में कानूनों की व्याख्या करते समय सहमति और वयस्कों के अधिकारों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

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