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तारीख पर तारीख पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, न्यायिक व्यवस्था पर उठाए सवाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दशकों से लंबित मामलों पर चिंता जताते हुए न्यायिक प्रशासन, जवाबदेही और पारदर्शिता में सुधार की जरूरत बताई। अदालत ने मुख्य न्यायाधीश-केंद्रित व्यवस्था पर भी टिप्पणी की।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्षों से लंबित मामलों को लेकर न्याय व्यवस्था पर गंभीर चिंता जताई है। न्यायमूर्ति विनोद दीवाकर की एकल पीठ ने 28 सितंबर के आदेश में कहा कि कुछ मामले 20 साल से अधिक समय से लंबित हैं, जबकि कुछ मामलों का निपटारा 40 साल से भी अधिक समय में नहीं हुआ। पीठ ने ‘तारीख पर तारीख’ की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि सदियों बाद भी वही निराशा दिखाई दे रही है।

निचली अदालतों में वर्षों से लंबित चार याचिकाओं को मंजूर करते हुए न्यायमूर्ति विनोद दीवाकर ने कहा कि इतनी लंबी लंबित अवधि संस्था की छवि के लिए अच्छी नहीं है। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश से इस समस्या को गंभीरता और तत्काल प्राथमिकता के साथ देखने का अनुरोध किया।

अदालत ने केवल मामलों की देरी तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि न्यायिक प्रशासन, जवाबदेही और अदालतों के प्रभावी संचालन पर भी व्यापक टिप्पणियां कीं। पीठ ने हाईकोर्ट के प्रशासन में मुख्य न्यायाधीश-केंद्रित व्यवस्था में बदलाव की जरूरत बताते हुए अधिक विचार-विमर्श, संस्थागत संतुलन और भागीदारी आधारित व्यवस्था पर जोर दिया।

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पीठ ने न्यायिक चरित्र को प्रभावित करने वाले कारकों का भी उल्लेख किया। अदालत के अनुसार, वंशवादी विशेषाधिकार, भाई-भतीजावाद, जातिवाद और सामंती संरक्षण जैसी प्रवृत्तियां न्यायिक संस्था की निष्पक्षता को कमजोर कर सकती हैं। अदालत ने कहा कि न्यायपालिका के पास न सेना है और न धनबल, बल्कि उसका आधार नागरिकों का न्यायिक फैसलों पर विश्वास है।

अदालत ने हाईकोर्ट में प्रशासनिक फैसलों और न्यायाधीशों के बीच जिम्मेदारियों के बंटवारे पर भी सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि काम के आवंटन को प्रदर्शन से जोड़ने वाले स्पष्ट मानक नहीं हैं और पदोन्नति तथा उच्च स्तर पर नियुक्ति के लिए निर्धारित और अधिसूचित मापदंडों की कमी है।

पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल करने वाले न्यायाधीशों की मनमानी या भेदभावपूर्ण कार्रवाई की स्थिति में “न्यायाधीश का न्याय कौन करेगा?” अदालत ने प्रभावी जांच और संतुलन की जरूरत बताई।

आदेश में कहा गया कि पिछले 10 वर्षों में केवल 16 पूर्ण न्यायालय बैठकें हुईं। हाईकोर्ट नियमों के अनुसार सामान्य नीतिगत मामलों और न्याय प्रशासन की वार्षिक रिपोर्ट को पूर्ण न्यायालय के समक्ष रखा जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि पिछले दशक में ऐसा नहीं हुआ, जो प्रशासनिक व्यवस्था की स्थिति पर सवाल खड़े करता है।

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