अमेरिका, चीन और पाकिस्तान से भारत तक: सैन्य नेतृत्व और राजनीतिक नियंत्रण के बढ़ते सवाल
अमेरिका, चीन और पाकिस्तान में सैन्य नेतृत्व और राजनीतिक नियंत्रण के बीच तनाव अलग-अलग रूपों में सामने आया है। भारत के लिए पेशेवर सैन्य स्वतंत्रता और राजनीतिक दिशा में संतुलन जरूरी है।
अमेरिका, चीन और पाकिस्तान में हाल के नागरिक-सैन्य तनाव को दो प्रमुख नजरियों से समझा जा सकता है—राजनीतिक नियंत्रण और सैन्य प्रभावशीलता। अमेरिका में रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ और सेना प्रमुख जनरल रैंडी जॉर्ज के बीच विवाद के बाद वरिष्ठ सैन्य नेतृत्व में अस्थिरता बढ़ी है। एक हेलीकॉप्टर से जुड़ी सुरक्षा घटना की जांच कराने की जॉर्ज की इच्छा और मामले को खत्म करने के हेगसेथ के निर्देश के बाद जॉर्ज को पद से हटा दिया गया।
अमेरिका में राजनीतिक नेतृत्व राष्ट्रीय लक्ष्य तय करता है, जबकि सेना से अपेक्षा होती है कि वह सैन्य विशेषज्ञता के आधार पर सलाह दे और वैध नीतियों को लागू करे। लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों में लगातार बदलाव से सैन्य क्षमता और नेतृत्व की निरंतरता प्रभावित हो सकती है।
पीट हेगसेथ ने अमेरिकी सेना में ‘योद्धा संस्कृति’ और युद्धक क्षमता पर जोर दिया है। हालांकि, उनके कार्यकाल में वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों में कई बदलाव हुए हैं। लेख के अनुसार, इससे नई युद्ध तकनीकों, ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध से जुड़े प्रयोगों पर भी असर पड़ा है। इसी तरह नागरिक क्षति कम करने के लिए बनाई गई व्यवस्था में कटौती को लेकर भी सवाल उठे हैं।
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चीन में स्थिति अलग है। वहां पीपुल्स लिबरेशन आर्मी सीधे कम्युनिस्ट पार्टी के नियंत्रण में है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भ्रष्टाचार और कथित अवफादारी के खिलाफ बड़े स्तर पर अभियान चलाया है। 2022 के बाद से 100 से अधिक वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को हटाया गया या वे सार्वजनिक जीवन से गायब हुए। इससे ताइवान के खिलाफ संभावित जटिल सैन्य अभियान की तैयारी में अनुभवी नेतृत्व को लेकर चिंता पैदा हुई है।
पाकिस्तान में इसके विपरीत सैन्य कमान को अधिक केंद्रीकृत किया गया है। फील्ड मार्शल असीम मुनीर के पास सेना प्रमुख और रक्षा बलों के प्रमुख की जिम्मेदारियां होने से संचालन क्षमता बढ़ाने का तर्क दिया गया है। लेकिन पाकिस्तान की राजनीति में सेना की पहले से मजबूत भूमिका के कारण इस बदलाव के लोकतांत्रिक संतुलन पर सवाल उठते हैं।
भारत के लिए संदेश स्पष्ट है। सेना को निर्वाचित सरकार के राष्ट्रीय उद्देश्यों के अनुरूप काम करना चाहिए, लेकिन सैन्य नेतृत्व को पेशेवर सलाह देने की स्वतंत्रता भी मिलनी चाहिए। रक्षा आत्मनिर्भरता, सीमा ढांचा, अंतरिक्ष, साइबर क्षमता और संयुक्त सैन्य संचालन में राजनीतिक दिशा जरूरी है।
चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की व्यवस्था और तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल महत्वपूर्ण कदम हैं। भारत को सैन्य शक्ति निर्माण में मजबूत राजनीतिक नेतृत्व के साथ पेशेवर निष्पक्षता, स्पष्ट सलाह और संस्थागत संतुलन बनाए रखना होगा। यही संतुलन भविष्य के युद्धों में प्रभावी निर्णय और राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है।