नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बने अनुराग जैन, केंद्र सरकार ने जारी किया नियुक्ति आदेश
केंद्र सरकार ने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अनुराग जैन को नीति आयोग का मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया है। यह नियुक्ति दो वर्ष अथवा अगले आदेश तक प्रभावी रहेगी।
केंद्र सरकार ने वरिष्ठ भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी अनुराग जैन को नीति आयोग का नया मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) नियुक्त किया है। इस नियुक्ति को मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति (एसीसी) ने मंजूरी प्रदान की है। कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग द्वारा जारी आदेश के अनुसार, अनुराग जैन पदभार ग्रहण करने की तिथि से अपने सेवा विस्तार की स्वीकृत अवधि तथा उसके बाद कुल दो वर्ष अथवा अगले आदेश तक, जो भी पहले हो, इस पद पर कार्य करेंगे। उनकी नियुक्ति की शर्तें पूर्व सीईओ के समान रहेंगी।
अनुराग जैन वर्ष 1989 बैच के मध्य प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी हैं। अपने लंबे प्रशासनिक करियर में उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई हैं। प्रशासनिक अनुभव और नीतिगत कार्यों में उनकी भूमिका को देखते हुए उन्हें यह महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया है।
इस वर्ष की शुरुआत में प्रख्यात अर्थशास्त्री अशोक कुमार लाहिड़ी को नीति आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया था। उन्होंने सुमन के. बेरी का स्थान लिया। इसके अलावा राजीव गौबा, प्रोफेसर के. वी. राजू, प्रोफेसर गोबर्धन दास, डॉ. एम. श्रीनिवास और प्रोफेसर अभय करंदीकर को नीति आयोग का पूर्णकालिक सदस्य बनाया गया।
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हाल ही में गुजरात ने नीति आयोग के पहले निवेश अनुकूलता सूचकांक 2026 में 56.6 अंक हासिल कर प्रमुख राज्यों में पहला स्थान प्राप्त किया। महाराष्ट्र 53.7 अंकों के साथ दूसरे और तमिलनाडु 53.3 अंकों के साथ तीसरे स्थान पर रहा। यह सूचकांक 84 मानकों और आठ प्रमुख स्तंभों के आधार पर राज्यों के प्रदर्शन का मूल्यांकन करता है। इसमें नीति एवं सुशासन, आधारभूत संरचना, कारोबार सुगमता और वित्तीय प्रबंधन जैसे पहलुओं को शामिल किया गया है।
इससे पहले 11 जून को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में नीति आयोग की 11वीं गवर्निंग काउंसिल की बैठक आयोजित हुई थी। "विकसित भारत@2047 के लिए समावेशी मानव विकास" विषय पर आयोजित इस बैठक में 28 राज्यों तथा पांच केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री, उपराज्यपाल और प्रशासकों ने भाग लिया। पहली बार सभी 28 राज्यों की भागीदारी दर्ज की गई, जिसे सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया।