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इक्कीस हमेशा के लिए: युद्ध में जाने की जिद करने वाले वीर अरुण खेत्रपाल की अमर गाथा

21 वर्ष की उम्र में शहीद सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल ने 1971 युद्ध में अद्वितीय साहस दिखाया और परमवीर चक्र प्राप्त कर भारतीय सैन्य इतिहास में अमर हो गए।

सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की कहानी भारतीय सैन्य इतिहास के सबसे भावुक और प्रेरणादायी अध्यायों में से एक मानी जाती है। सैनावर के प्रतिष्ठित लॉरेंस स्कूल के बैंड रूम से लेकर 1971 के भारत-पाक युद्ध में बसंतर नदी के किनारे लड़ी गई भीषण टैंक लड़ाइयों तक का उनका सफर साहस, कर्तव्य और बलिदान का प्रतीक है।

म्यांमार के यांगून स्थित द्वितीय विश्व युद्ध के एक कब्रिस्तान में एक सैनिक की कब्र पर लिखा एक मार्मिक वाक्य है—“अगर आपने हमारे इस लड़के को जाना होता, तो आप भी उसे प्यार करते।” यही पंक्ति परमवीर चक्र (मरणोपरांत) से सम्मानित सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल पर भी पूरी तरह लागू होती है। मात्र 21 वर्ष की आयु में शहीद हुए अरुण खेत्रपाल एक ऐसे ‘बाल’ अधिकारी थे, जिन्होंने भारतीय सेना की सर्वोच्च परंपराओं को अपने जीवन और बलिदान से जीवंत कर दिया।

1971 के युद्ध के दौरान, बसंतर सेक्टर में दुश्मन के टैंकों का सामना करते हुए उन्होंने असाधारण वीरता का प्रदर्शन किया। कहा जाता है कि उन्होंने अपने कमांडर से युद्ध में जाने की अनुमति के लिए आग्रह किया और अंत तक अपनी पोस्ट नहीं छोड़ी। दुश्मन के कई टैंकों को नष्ट करने के बाद भी वे डटे रहे और अंततः मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।

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अरुण खेत्रपाल की शहादत उन्हें अमर बनाती है। आज भी वे भारतीय सेना के जवानों और युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। यदि वे जीवित होते, तो आज 75 वर्ष के होते, लेकिन उनका साहस, समर्पण और देशप्रेम उन्हें समय से परे एक अमर नायक बना देता है।

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