अरुंधति रॉय: फासीवाद के खिलाफ खड़े अंतिम गढ़ों में केरल शामिल
अरुंधति रॉय ने केरल को फासीवाद के खिलाफ खड़े अंतिम गढ़ों में बताया और कहा कि लोगों को अपने अधिकारों, मूल्यों और उपलब्धियों को बचाने के लिए संघर्ष करना होगा।
प्रसिद्ध लेखिका और सामाजिक चिंतक अरुंधति रॉय ने केरल को फासीवाद के खिलाफ खड़े “अंतिम कुछ गढ़ों” में से एक बताया है। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में जब लोकतांत्रिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगातार दबाव बढ़ रहा है, तब केरल जैसे राज्य उम्मीद की किरण बने हुए हैं। रॉय के अनुसार, ऐसे हालात में लोगों की जिम्मेदारी है कि वे जो अधिकार, मूल्य और सामाजिक संरचनाएं उनके पास हैं, उन्हें संरक्षित करें और उनके लिए संघर्ष करें।
अरुंधति रॉय यह टिप्पणी बुधवार, 28 जनवरी 2026 को तिरुवनंतपुरम स्थित राज्य सार्वजनिक पुस्तकालय सभागार में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कर रही थीं। इस अवसर पर उन्हें साहित्य के क्षेत्र में आजीवन योगदान के लिए मलयाट्टूर फाउंडेशन का पुरस्कार प्रदान किया गया। पुरस्कार ग्रहण करने के बाद दिए गए अपने संबोधन में उन्होंने देश की मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों पर भी टिप्पणी की।
उन्होंने कहा कि फासीवाद केवल सत्ता या शासन व्यवस्था का रूप नहीं होता, बल्कि यह धीरे-धीरे समाज के भीतर घुसपैठ करता है और लोगों की सोच, बोलने की आज़ादी तथा असहमति के अधिकार को सीमित करता है। ऐसे समय में, रॉय के अनुसार, केरल ने अपनी सामाजिक चेतना, शिक्षा, सांस्कृतिक विविधता और लोकतांत्रिक परंपराओं के बल पर खुद को अलग पहचान दी है।
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अरुंधति रॉय ने जोर देकर कहा कि किसी भी समाज में जो भी सकारात्मक उपलब्धियां हैं, वे स्वतः सुरक्षित नहीं रहतीं। उन्हें बचाने के लिए सतत प्रयास, जागरूकता और संघर्ष की जरूरत होती है। उन्होंने यह भी कहा कि आम लोगों की भागीदारी और सक्रियता ही किसी भी राज्य या देश को अधिनायकवादी प्रवृत्तियों के खिलाफ मजबूती से खड़ा कर सकती है।
कार्यक्रम में साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और पाठकों की बड़ी संख्या मौजूद रही। रॉय के विचारों को श्रोताओं ने गंभीरता से सुना और उन्हें समकालीन भारत के संदर्भ में बेहद प्रासंगिक बताया।
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