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बंगाल निकाय चुनाव में अकेले उतरने के संकेत, बीजेपी ने एनसीपीआई के साथ गठबंधन की संभावना को किया दरकिनार

पश्चिम बंगाल के आगामी निकाय चुनाव में बीजेपी ने अकेले चुनाव लड़ने के संकेत दिए हैं। एनसीपीआई की गठबंधन की मांग के बावजूद पार्टी ने अपनी तैयारी तेज कर दी है।

पश्चिम बंगाल में आगामी निकाय चुनावों को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने फिलहाल अकेले चुनाव लड़ने के संकेत दिए हैं। केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सहयोगी एनसीपीआई की ओर से राज्य में भी गठबंधन के तहत चुनाव लड़ने की इच्छा जताए जाने के बावजूद बीजेपी की प्रदेश इकाई अपनी स्वतंत्र रणनीति पर आगे बढ़ रही है। निकाय चुनाव दिसंबर में होने की संभावना जताई जा रही है।

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने बुधवार को कहा कि पार्टी अपने दम पर चुनाव लड़ेगी और जनता के बड़े समर्थन के साथ नगर निकायों में बोर्ड बनाने का प्रयास करेगी। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी का राजनीतिक विस्तार किसी अन्य दल की मदद पर निर्भर नहीं रहा है।

भट्टाचार्य ने कहा कि बीजेपी ने राज्य में अपने दम पर चुनाव लड़े और सत्ता तक पहुंची। उनके मुताबिक पार्टी ने न तो किसी की कृपा से और न ही किसी अन्य दल के समर्थन के आधार पर अपनी राजनीतिक पहचान बनाई है।

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बीजेपी का यह रुख ऐसे समय आया है जब एनसीपीआई के वरिष्ठ नेता बंगाल में दोनों दलों के बीच चुनावी समझौते की वकालत कर रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस से अलग होकर एनसीपीआई के साथ आए पूर्व सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय और काकोली घोष दस्तीदार ने संकेत दिया है कि पार्टी बीजेपी के साथ मिलकर निकाय चुनाव लड़ सकती है।

घोष दस्तीदार का कहना है कि केंद्र में एनडीए का हिस्सा होने के कारण एनसीपीआई को पश्चिम बंगाल में भी बीजेपी के साथ गठबंधन करना चाहिए। हालांकि बीजेपी का कहना है कि दिल्ली में बनी राजनीतिक साझेदारी को सीधे बंगाल में लागू नहीं किया जा सकता।

केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार ने भी गठबंधन पर कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता नहीं जताई। उन्होंने कहा कि बीजेपी फिलहाल कोलकाता नगर निगम के सभी 209 वार्डों में संगठनात्मक तैयारी पर ध्यान दे रही है।

पश्चिम बंगाल में कुल 128 निकाय हैं, जिनमें सात नगर निगम शामिल हैं। विधानसभा चुनाव में टीएमसी के 15 साल के शासन का अंत करने के बाद होने वाले ये निकाय चुनाव बीजेपी के लिए जमीनी पकड़ मजबूत करने की बड़ी परीक्षा होंगे। वहीं, टीएमसी के लिए भी यह चुनाव विधानसभा हार के बाद संगठनात्मक वापसी का महत्वपूर्ण मौका होगा।

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