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ब्रिक्स में अंदरूनी मतभेद: क्या अलग-अलग हितों से ऊपर उठकर वैश्विक शक्ति बन सकता है समूह?

ब्रिक्स ने नई दिल्ली घोषणा-पत्र अपनाया, लेकिन सदस्य देशों के अलग-अलग रणनीतिक और आर्थिक हित चुनौती बने हुए हैं। भारत समूह को संतुलित, सहयोगी और प्रभावशाली वैश्विक मंच बनाना चाहता है।

ब्रिक्स 11 देशों का समूह है, जिसे पश्चिमी देश अमेरिका और उसके सहयोगियों के मुकाबले एक संभावित शक्ति के रूप में देखते हैं। हालांकि, ब्रिक्स लगातार स्पष्ट करता रहा है कि यह किसी देश के खिलाफ गठबंधन नहीं है।

भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक सफलता के रूप में शनिवार को ब्रिक्स ने नई दिल्ली घोषणा-पत्र को मंजूरी दी। पश्चिम एशिया में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच मतभेदों के बावजूद घोषणा-पत्र को सर्वसम्मति से अपनाया गया। इसमें पिछले साल हुए पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की गई और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार तथा ग्लोबल साउथ की समान भागीदारी की मांग की गई।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि बदलती दुनिया को पुरानी संस्थाओं के जरिए नहीं चलाया जा सकता। उन्होंने प्रतिनिधित्व, जवाबदेही और नियम बनाने की प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि नई दिल्ली घोषणा-पत्र को ठोस परिणामों में बदलना अब सभी देशों की जिम्मेदारी है।

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ब्रिक्स की शुरुआत का विचार गोल्डमैन सैक्स के मुख्य अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने 2001 में दिया था। 2009 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन ने मिलकर समूह बनाया। 2011 में दक्षिण अफ्रीका इसके साथ जुड़ा। जनवरी 2025 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और यूएई के शामिल होने से ब्रिक्स का विस्तार हुआ।

हालांकि, समूह के सामने कई चुनौतियां हैं। रूस, चीन और ईरान ब्रिक्स को अमेरिकी प्रभाव के मुकाबले मजबूत मंच और डॉलर पर निर्भरता घटाने के माध्यम के रूप में देखते हैं। दूसरी ओर, यूएई और सऊदी अरब अमेरिका के पुराने साझेदार हैं और ईरान के क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी भी हैं।

चीन ब्रिक्स की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति है, इसलिए भारत और ब्राजील यह सुनिश्चित करने की कोशिश करते हैं कि समूह चीन-केंद्रित मंच न बने। भारत-चीन सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा भी चुनौती है।

अमेरिका में भी ब्रिक्स को लेकर चिंता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे “अमेरिका विरोधी” बता चुके हैं और डॉलर को कमजोर करने की कोशिश पर 100 प्रतिशत शुल्क की धमकी दे चुके हैं। इसके बावजूद पीएम मोदी ने कहा कि ग्लोबल साउथ को केवल संकट झेलने वाला नहीं, बल्कि वैश्विक नियमों को आकार देने वाला पक्ष बनना चाहिए।

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