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नई दिल्ली में ब्रिक्स का निर्माण: भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की परीक्षा

नई दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने भारत की रणनीतिक स्वायत्तता, वैश्विक संस्थागत सुधार, स्थानीय मुद्रा व्यापार, कूटनीतिक संवाद और ग्लोबल साउथ की बढ़ती भूमिका को प्रमुखता से सामने रखा।

नई दिल्ली में आयोजित 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन वैश्विक भू-राजनीति के महत्वपूर्ण दौर में हो रहा है। मूल ब्रिक्स समूह के गठन के दो दशक बाद अब यह संगठन 11 पूर्ण सदस्य देशों तक विस्तार कर चुका है। इसमें संयुक्त अरब अमीरात, ईरान, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया और सऊदी अरब जैसे देश शामिल हैं। ऐसे में संगठन अपनी भूमिका और संस्थागत प्रभाव को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश कर रहा है।

भारत की अध्यक्षता में आयोजित सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग सहित कई नेताओं के साथ द्विपक्षीय बातचीत हुई। शी चिनफिंग की सात साल बाद भारत यात्रा ने खास तौर पर सीमा पर तनाव कम करने और व्यापार एवं निवेश संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में भारत की कोशिशों को रेखांकित किया।

भारत के लिए ब्रिक्स की मेजबानी उसकी विदेश नीति के प्रमुख सिद्धांत ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की परीक्षा भी है। भारत एक ओर क्वाड और आई2यू2 जैसे पश्चिमी देशों से जुड़े समूहों का हिस्सा है, वहीं दूसरी ओर ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन में भी सक्रिय भूमिका निभाता है।

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मध्य पूर्व के विभिन्न पक्षों को एक मंच पर लाकर भारत ने संवाद के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मई में विदेश मंत्रियों के स्तर पर संयुक्त बयान पर सहमति नहीं बन पाने के बावजूद नई दिल्ली घोषणा को सभी सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया।

घोषणा में पश्चिम एशिया की स्थिति पर चिंता जताते हुए नागरिकों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा, मानवीय सहायता और दो-राष्ट्र समाधान पर जोर दिया गया। यूक्रेन संघर्ष पर भी किसी एक देश की निंदा करने के बजाय संवाद और कूटनीति से समाधान का समर्थन किया गया।

आर्थिक मोर्चे पर ब्रिक्स अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान व्यवस्था को बढ़ावा दे रहा है। हालांकि, विभिन्न देशों की वित्तीय प्रणालियों और नियमों में अंतर बड़ी चुनौती है।

ब्रिक्स के विस्तार ने इसकी ताकत बढ़ाई है, लेकिन ईरान-यूएई जैसे क्षेत्रीय मतभेद और पश्चिम के प्रति संगठन के रुख पर अलग-अलग विचार भी मौजूद हैं। भारत इसे ‘पश्चिम-विरोधी नहीं, बल्कि गैर-पश्चिमी’ मंच के रूप में देखता है।

नई दिल्ली शिखर सम्मेलन ने बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में ब्रिक्स की बढ़ती भूमिका को रेखांकित किया है। अब अगले वर्ष चीन की अध्यक्षता में संगठन की एकता और प्रभावशीलता की अगली परीक्षा होगी।

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