न्याय व्यवस्था लंबे समय से आरोपी और अपराध पर केंद्रित रही, पीड़ित पीछे छूट जाता है: सीजेआई
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि आपराधिक न्याय व्यवस्था लंबे समय से आरोपी और अपराध केंद्रित रही है। उन्होंने बिहार में पीड़ित अधिकार केंद्र, हेल्पलाइन और सहायता सुविधाओं का उद्घाटन किया।
भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि आपराधिक न्याय प्रक्रिया लंबे समय से आरोपी और अपराध के इर्द-गिर्द केंद्रित रही है, जबकि पीड़ित अक्सर अपना बयान दर्ज कराने के बाद न्यायिक प्रक्रिया में पीछे छूट जाता है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने यह बात बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (बीएसएलएसए) परिसर में पीड़ित अधिकार केंद्र (वीआरसी) का उद्घाटन करते हुए कही। उन्होंने कहा कि पीड़ित एक बयान दर्ज कराने के बाद गवाही के दिन तक अक्सर न्याय प्रक्रिया से लगभग गायब हो जाता है।
सीजेआई ने कहा कि अपराध के बाद पीड़ित पहले ही मानसिक और शारीरिक पीड़ा से गुजर रहा होता है। इसके बावजूद उसे ऐसी व्यवस्था से गुजरना पड़ता है जिसकी भाषा और प्रक्रिया कई बार उसके लिए समझना मुश्किल होती है। उन्होंने कहा कि न्याय प्रक्रिया खुद पीड़ित के लिए दूसरी चोट जैसी महसूस हो सकती है।
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एक केंद्र पर मिलेगी कई तरह की सहायता
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि पीड़ित अधिकार केंद्र एक ही मंच पर मुआवजा योजनाओं, कानूनी और चिकित्सा सहायता, परामर्श, सुरक्षा तथा पुनर्वास सेवाओं को उपलब्ध कराने में मदद करेगा।
उन्होंने कहा कि पीड़ितों के लिए उपलब्ध कई अधिकार अलग-अलग कानूनों, विभागों और संस्थानों में बिखरे हुए हैं। कानून में प्रावधान होने के बावजूद जरूरतमंद व्यक्ति को यह पता नहीं होता कि सहायता कहां और कैसे मिलेगी।
सीजेआई ने कहा कि केंद्र का उद्देश्य ‘‘एक केंद्र, एक फाइल और एक जवाबदेही बिंदु’’ की व्यवस्था स्थापित करना है।
ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए हेल्पलाइन
कार्यक्रम में पीड़ित अधिकार केंद्र के अलावा केंद्र के काम पर आधारित पुस्तिका, ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए हेल्पलाइन और एक बहुउद्देश्यीय वाहन भी शुरू किया गया।
उन्होंने कहा कि हेल्पलाइन का उद्देश्य उन लोगों तक सहायता पहुंचाना है, जिन्हें भेदभाव या उत्पीड़न की स्थिति में मदद पाने के लिए उचित स्थान तलाशने में कठिनाई होती है।
बहुउद्देश्यीय वाहन गांवों और दूरदराज की बस्तियों तक कानूनी जागरूकता, दस्तावेजी सहायता और शुरुआती मदद पहुंचाएगा। सीजेआई ने कहा कि न्याय तक पहुंच तभी पूरी मानी जाएगी, जब जरूरतमंद लोग वास्तव में न्याय व्यवस्था तक पहुंच सकें।
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