परिसीमन पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की कांग्रेस की मांग, लोकसभा की 543 सीटें 25 साल तक बरकरार रखने पर जोर
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने परिसीमन पर सर्वदलीय बैठक की मांग करते हुए लोकसभा की मौजूदा 543 सीटें 25 साल तक बरकरार रखने और महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग की।
परिसीमन को लेकर केंद्र सरकार की संभावित पहल के बीच कांग्रेस ने अपनी रणनीति स्पष्ट कर दी है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर परिसीमन प्रस्तावों पर चर्चा के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की। उन्होंने लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या अगले 25 वर्षों तक बरकरार रखने की मांग भी की।
खरगे ने कहा कि केंद्र सरकार को परिसीमन से जुड़े अपने प्रस्ताव सभी राजनीतिक दलों और राज्य सरकारों के साथ साझा करने चाहिए, ताकि उन्हें इनका अध्ययन करने के लिए पर्याप्त समय मिल सके। उन्होंने कहा कि संसद के विशेष सत्र में प्रस्ताव पेश करने से पहले सभी पक्षों के साथ व्यापक चर्चा जरूरी है।
कांग्रेस की तीन प्रमुख मांगें
खरगे ने कांग्रेस की तीन प्रमुख मांगें सामने रखीं। पहली, लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या 25 वर्षों तक नहीं बदली जाए। दूसरी, राज्यों को आवंटित लोकसभा सीटों की मौजूदा संख्या भी 25 वर्षों तक बरकरार रखी जाए। तीसरी, 2029 के लोकसभा चुनाव से महिलाओं को एक-तिहाई यानी 33 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए।
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खरगे ने प्रधानमंत्री से सर्वदलीय बैठक बुलाने की अपनी पहले की मांग दोहराते हुए कहा कि परिसीमन देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण विषय है। उन्होंने सरकार से अप्रैल 2026 में अपनाए गए तरीके को दोबारा न दोहराने की अपील की।
अप्रैल में विधेयक को नहीं मिली थी मंजूरी
बजट सत्र के दौरान 17 अप्रैल को परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा में आवश्यक समर्थन नहीं मिल सका था। प्रस्ताव में लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने और महिला आरक्षण कानून को लागू करने की व्यवस्था करने की बात थी।
विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े थे। हालांकि, संविधान संशोधन पारित करने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता थी।
कांग्रेस कार्यसमिति पहले भी लोकसभा सीटों की संख्या को लंबे समय तक स्थिर रखने और महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग दोहरा चुकी है। विपक्षी दलों का कहना है कि परिसीमन की प्रक्रिया में राज्यों और सभी राजनीतिक दलों के हितों को ध्यान में रखकर व्यापक सहमति बनाई जानी चाहिए।