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श्रीलंका में ऐतिहासिक प्रदर्शनी के बाद देवनीमोरी बुद्ध अवशेष भारत लौटे

देवनीमोरी के पवित्र बुद्ध अवशेष श्रीलंका में एक सप्ताह की प्रदर्शनी के बाद भारत लौटे। लाखों श्रद्धालुओं ने दर्शन किए। आयोजन ने भारत-श्रीलंका के आध्यात्मिक संबंधों को और मजबूत किया।

भगवान बुद्ध के पवित्र देवनीमोरी अवशेष एक सप्ताह तक श्रीलंका के कोलंबो स्थित गंगारामया मंदिर में सार्वजनिक प्रदर्शनी के बाद बुधवार को भारत लौट आए। यह पहला अवसर था जब इन अवशेषों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित किया गया।

इन पवित्र अवशेषों को उच्चस्तरीय भारतीय प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई में स्वदेश लाया गया। प्रतिनिधिमंडल में मध्य प्रदेश के राज्यपाल मंगुभाई पटेल, अरुणाचल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री चौना मीन, वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु और अधिकारी शामिल थे। कोलंबो के बंदरानायके अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर श्रीलंका के मंत्रियों और भारत के उच्चायुक्त की उपस्थिति में औपचारिक विदाई समारोह आयोजित किया गया।

4 से 10 फरवरी तक आयोजित इस प्रदर्शनी के दौरान श्रीलंका भर से दस लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने मंदिर पहुंचकर अवशेषों के दर्शन किए। श्रीलंका के प्रधानमंत्री, कैबिनेट मंत्री, सांसद और पूर्व राष्ट्रपति सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रदर्शनी का उद्घाटन राष्ट्रपति अनुर कुमार दिसानायके ने किया। श्रीलंकाई नेताओं ने इस आयोजन के लिए भारत सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति आभार जताया।

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प्रदर्शनी के साथ “अनअर्थिंग द सेक्रेड पिपरहवा” और “सेक्रेड रेलिक एंड कल्चरल एंगेजमेंट ऑफ कंटेम्पररी इंडिया” शीर्षक से प्रदर्शनियां भी आयोजित की गईं, जिनमें भारत और श्रीलंका की साझा बौद्ध विरासत और सभ्यतागत संबंधों को दर्शाया गया।

देवनीमोरी अवशेष गुजरात के अरावली जिले में शामलाजी के निकट स्थित पुरातात्विक स्थल से प्राप्त हुए थे। वर्ष 1957 में प्रो. एस. एन. चौधरी द्वारा यहां खुदाई में बौद्ध स्तूप और महत्वपूर्ण अवशेष मिले थे, जो प्रारंभिक शताब्दियों में पश्चिमी भारत में बौद्ध धर्म के प्रसार को दर्शाते हैं।

स्तूप से 24 फीट की ऊंचाई पर हरे शिस्ट पत्थर से बनी एक रत्नपेटिका मिली, जिस पर ब्राह्मी लिपि और संस्कृत में “दशबल शरीर निलय” अंकित है, जिसका अर्थ है बुद्ध के शारीरिक अवशेषों का निवास। इसके भीतर तांबे की डिब्बी में पवित्र राख, रेशमी वस्त्र और मनके सुरक्षित पाए गए।

वर्तमान में इन अवशेषों को विशेष कांच के वायुरुद्ध पात्र में सुरक्षित रखा गया है, ताकि दीर्घकालिक संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।

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