परामर्श नहीं किया गया: चुनाव अधिकारियों पर कार्रवाई को लेकर पश्चिम बंगाल सरकार पर चुनाव आयोग की आपत्ति
चुनाव आयोग ने मतदाता सूची अनियमितताओं के मामले में अधिकारियों पर कार्रवाई से पहले परामर्श न करने पर पश्चिम बंगाल सरकार की आलोचना की और 72 घंटे में रिपोर्ट मांगी।
भारत के चुनाव आयोग (ईसी) ने पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा चुनाव अधिकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई पर कड़ी आपत्ति जताई है। चुनाव आयोग का कहना है कि राज्य सरकार ने विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन – SIR) से जुड़े मामलों में दोषी पाए गए अधिकारियों को दंडित करने से पहले आयोग से अनिवार्य परामर्श नहीं किया। इस संबंध में आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव को एक पत्र भेजकर अपनी नाराजगी दर्ज कराई है।
चुनाव आयोग की जांच में पाया गया कि पश्चिम बंगाल के चार चुनाव अधिकारी मतदाता सूची की तैयारी और संशोधन प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं में शामिल थे। इनमें बारुईपुर पूर्व विधानसभा क्षेत्र के ईआरओ देवोत्तम दत्ता चौधरी, सहायक ईआरओ (AERO) तथागत मंडल, मोयना विधानसभा क्षेत्र के ईआरओ बिओलोब सरकार और सहायक ईआरओ सुधीप्त दास शामिल हैं।
चुनाव आयोग ने 5 अगस्त को राज्य सरकार को इन अधिकारियों को निलंबित करने, उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने और प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज करने का निर्देश दिया था। हालांकि, राज्य सरकार ने इन निर्देशों का केवल आंशिक रूप से पालन किया। इसके बाद तत्कालीन मुख्य सचिव मनोज पंत को नई दिल्ली तलब किया गया, जहां चुनाव आयोग ने अपना रुख स्पष्ट किया और एफआईआर दर्ज करने से पहले जांच कराने की राज्य सरकार की मांग पर सहमति जताई।
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अपने पत्र में चुनाव आयोग ने कहा कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना और आयोग से अनिवार्य परामर्श किए बिना अनुशासनात्मक कार्रवाई को अंतिम रूप दिया गया है, जिसे आयोग स्वीकार नहीं करता। आयोग के अनुसार, यह कार्रवाई प्रक्रियागत रूप से अनियमित है और उसके दृष्टिकोण से अमान्य (नॉन-एस्ट) मानी जाएगी। इसलिए इस पर पुनर्विचार करना आवश्यक है।
चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल सरकार से 72 घंटे के भीतर रिपोर्ट मांगी है कि इस चूक के लिए कौन जिम्मेदार है और यह लापरवाही क्यों हुई। साथ ही, आयोग ने चारों अधिकारियों के खिलाफ की गई जांच का पूरा विवरण भी तलब किया है।
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