मोटापे पर लगाम के लिए अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स के प्रचार पर प्रतिबंध और उच्चतम जीएसटी की सिफारिश
आर्थिक सर्वेक्षण 2026-27 ने मोटापे से निपटने के लिए अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स के विज्ञापनों पर समयबद्ध प्रतिबंध और इन पर उच्चतम जीएसटी लगाने की सिफारिश की है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2026-27 में भारतीयों के खान-पान में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (UPFs) की बढ़ती हिस्सेदारी पर गंभीर चिंता जताई गई है। सर्वेक्षण में सुझाव दिया गया है कि मोटापे की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए ऐसे खाद्य उत्पादों के प्रचार-प्रसार पर कड़े प्रतिबंध लगाए जाएं और इन पर उच्चतम वस्तु एवं सेवा कर (GST) लगाया जाए। यह सर्वेक्षण वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार (29 जनवरी, 2026) को लोकसभा में पेश किया।
सर्वेक्षण के अनुसार, सभी प्रकार के मीडिया प्लेटफॉर्म पर सुबह 6 बजे से रात 11 बजे तक अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स के विज्ञापनों पर रोक लगाने पर विचार किया जाना चाहिए। इसमें टेलीविजन, डिजिटल प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया और अन्य माध्यम शामिल हैं। इसके साथ ही शिशुओं और छोटे बच्चों के लिए बनाए जाने वाले दूध और पेय पदार्थों के विपणन पर भी प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की गई है, ताकि कम उम्र से ही अस्वास्थ्यकर खान-पान की आदतों को रोका जा सके।
आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि कंपनियां सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट, भावनात्मक अपील और आक्रामक मार्केटिंग रणनीतियों के जरिए इन उत्पादों को बढ़ावा देती हैं, जिससे उपभोक्ताओं पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यह प्रवृत्ति मोटापे और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से निपटने में एक बड़ी चुनौती बन गई है।
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सर्वेक्षण ने विज्ञापन संहिता (Advertisement Code) में मौजूद नीतिगत खामियों की ओर भी ध्यान दिलाया है। इसमें कहा गया है कि भ्रामक, अप्रमाणित या अस्वास्थ्यकर विज्ञापनों पर प्रतिबंध तो है, लेकिन ‘भ्रामक’ शब्द की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है, जिससे इसकी व्याख्या अलग-अलग तरीके से की जा सकती है। इसी तरह, केंद्र सरकार के दिशा-निर्देश स्वास्थ्य लाभों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने से रोकते हैं, लेकिन पोषक तत्वों की स्पष्ट सीमा या भ्रामक दावों की पहचान के लिए ठोस ढांचा मौजूद नहीं है।
सर्वेक्षण का मानना है कि इन नीतिगत कमियों को दूर कर और सख्त कर व्यवस्था व विज्ञापन नियंत्रण लागू कर भारत में मोटापे की बढ़ती समस्या पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।
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