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सऊदी अरब में फांसी की सजा का इंतजार कर रहे इथियोपियाई कैदियों ने BBC से लगाई मदद की गुहार

सऊदी अरब की जेलों में मौत की सजा का इंतजार कर रहे कई इथियोपियाई कैदियों ने मदद की अपील की है। मानवाधिकार संगठनों ने न्याय प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।

सऊदी अरब की जेलों में मौत की सजा का इंतजार कर रहे कई इथियोपियाई कैदियों ने अपनी जान बचाने के लिए मदद की गुहार लगाई है। इनमें से कुछ कैदियों ने जेल की कोठरी से बीबीसी की तिग्रिन्या भाषा सेवा से संपर्क कर अपनी स्थिति बताई और सरकारों से हस्तक्षेप की अपील की।

इनमें से एक इथियोपियाई युवक हैबटॉम (बदला हुआ नाम) ने सऊदी अरब के दक्षिणी शहर खमीस मुशैत की जेल से फोन पर बातचीत की। वह पिछले तीन वर्षों से अधिक समय से मौत की सजा वाले कैदियों की बैरक में बंद है। उसने कहा कि कैदी एक-दूसरे को सांत्वना देने की स्थिति में नहीं हैं और उन्हें केवल अपने अंत का इंतजार करना पड़ रहा है।

हैबटॉम ने कहा, "एक कैदी दूसरे कैदी को दिलासा नहीं दे सकता। हमारे पास रोने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। हम अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन यह नहीं जानते कि वह कब आएगी।"

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हैबटॉम और उसके कई साथी युद्ध और गरीबी से बचने के लिए बेहतर जीवन की तलाश में अपने देश से निकले थे। उनका सफर जिबूती और यमन से होकर गुजरा, लेकिन अंत में वे सऊदी अरब की जेलों में पहुंच गए। उन पर नशीले पदार्थों की तस्करी के आरोप लगे हैं, जिन मामलों में उन्हें फांसी की सजा का सामना करना पड़ रहा है।

बीबीसी ने ऐसे सात इथियोपियाई कैदियों से बातचीत की, जो सऊदी जेलों में बंद हैं। बताया गया कि वहां ऐसे कैदियों की संख्या कई दर्जन से लेकर करीब 200 तक हो सकती है। इनके अलावा पाकिस्तान, सूडान और जॉर्डन के नागरिक भी इसी तरह की स्थिति का सामना कर रहे हैं।

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, इस साल के पहले सात महीनों में 17 इथियोपियाई नागरिकों को सऊदी अरब में फांसी दी गई, जो गैर-सऊदी नागरिकों में सबसे अधिक संख्या है। वर्ष 2025 में 35 इथियोपियाई लोगों को मृत्युदंड दिया गया था, जबकि दो साल पहले यह संख्या केवल दो थी।

मानवाधिकार संगठनों रिप्रीव, ह्यूमन राइट्स वॉच (एचआरडब्ल्यू) और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने सऊदी अरब की न्याय प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि ऐसे मामलों में आरोपियों को अक्सर वकील उपलब्ध नहीं कराया जाता, अदालती दस्तावेज नहीं दिए जाते और भाषा अनुवाद की व्यवस्था भी पर्याप्त नहीं होती।

एमनेस्टी की शोधकर्ता डाना अहमद ने कहा कि पूरी न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता की भारी कमी है। मौत की सजा पाए कैदी और उनके परिवार अक्सर अपने भविष्य को लेकर अंधेरे में रहते हैं।

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