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गुजरात में द्वारका कॉरिडोर की बड़ी पहल, बेट द्वारका को विश्वस्तरीय आध्यात्मिक केंद्र बनाने की तैयारी

गुजरात सरकार बेट द्वारका को विश्वस्तरीय आध्यात्मिक और इको-टूरिज्म केंद्र बनाने की तैयारी कर रही है। योजना में आधुनिक सुविधाएं, अतिक्रमण हटाना और तटीय पर्यटन विकास शामिल हैं।

गुजरात सरकार ने पवित्र द्वीप बेट द्वारका को विश्वस्तरीय आध्यात्मिक और इको-टूरिज्म केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए व्यापक पुनर्विकास योजना शुरू की है। काशी विश्वनाथ और उज्जैन के महाकाल कॉरिडोर की तर्ज पर तैयार की जा रही इस परियोजना का उद्देश्य हर साल आने वाले लाखों श्रद्धालुओं को आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराना है।

इसके तहत गुजरात के राजस्व विभाग ने 31 सर्वे नंबरों के अंतर्गत एक हेक्टेयर से अधिक भूमि के अधिग्रहण के लिए आधिकारिक अधिसूचना जारी की है। जगतमंदिर परिसर के एक बड़े हिस्से में आधुनिक बुनियादी ढांचा विकसित किया जाएगा। द्वारका के उपजिलाधिकारी को भूमि संबंधी प्रक्रिया और कानूनी औपचारिकताओं में तेजी लाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

यह पहल हाल ही में शुरू किए गए सुदर्शन सेतु के बाद सामने आई है। करीब 1,200 करोड़ रुपये की लागत से बना यह पुल ओखा को बेट द्वारका से जोड़ता है और भारत का सबसे लंबा केबल-स्टे ब्रिज बताया गया है। इसके पैदल रास्तों पर भगवद्गीता के श्लोक और भगवान कृष्ण की तस्वीरें सजाई गई हैं। पुल से श्रद्धालुओं को पूरे साल, चौबीसों घंटे सड़क संपर्क मिलता है। इससे पहले मानसून के दौरान समुद्र में ऊंची लहरों के कारण नौका सेवा अक्सर बाधित हो जाती थी।

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सरकार मंदिर के आसपास अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई भी कर रही है। गुजरात के गृह राज्य मंत्री हर्ष सांघवी ने कहा कि श्रद्धालुओं के कल्याण के लिए निर्धारित जमीन पर अवैध कब्जे हटाए जाएंगे, ताकि सार्वजनिक सुविधाएं विकसित हों और दर्शन आसान हो सकें।

द्वारका हिंदू धर्म के प्राचीन चार धाम तीर्थस्थलों में शामिल है। मुख्य द्वारका में प्रसिद्ध द्वारकाधीश मंदिर है, जबकि कच्छ की खाड़ी में स्थित बेट द्वारका को धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान कृष्ण का निवास स्थान माना जाता है। पौराणिक कथा के मुताबिक, यहीं कृष्ण अपने बचपन के मित्र सुदामा से मिले थे। सुदामा उनके लिए चिवड़ा लेकर आए थे और कृष्ण ने उन्हें स्नेहपूर्वक गले लगाया था। इसी परंपरा के कारण मंदिर में चावल अर्पित करने की प्रथा प्रचलित है।

परियोजना में तटीय पारिस्थितिकी, प्रवाल भित्तियों और जलक्रीड़ा को बढ़ावा देने की योजनाएं भी शामिल हैं। इससे स्थानीय कारोबार, पर्यटन, परिवहन और आतिथ्य क्षेत्र को लाभ मिलने की उम्मीद है, जबकि प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर भी जोर रहेगा।

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