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कोलकाता की भारत की इकलौती चाइनाटाउन, धीरे-धीरे इतिहास बनती जा रही

कोलकाता की इकलौती चाइनाटाउन में चीनी समुदाय की आबादी तेजी से घट रही है। कभी 50,000 रही संख्या अब करीब 2,000 रह गई, जिससे एक समृद्ध विरासत लुप्त होती दिख रही है।

कोलकाता की टेरेटी बाज़ार, जिसे उत्तर कोलकाता की पुरानी चाइनाटाउन के नाम से जाना जाता है, आज अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। कभी यहां हजारों की संख्या में रहने वाला चीनी समुदाय अब तेजी से सिमटता जा रहा है। 1960 के दशक में जहां कोलकाता में चीनी समुदाय की आबादी लगभग 50,000 थी, वहीं अब यह घटकर केवल करीब 2,000 रह गई है।

पश्चिम बंगाल में चल रही विशेष पहचान पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया में इस समुदाय की स्थिति और भी चिंताजनक दिखाई देती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 484 मतदाताओं में से 389 को  “अनुपस्थित” की श्रेणी में रखा गया है। यह गिरावट उस समुदाय की कहानी बयान करती है, जो 1840 के दशक से कोलकाता में बसना शुरू हुआ था और जिसने वर्षों तक भेदभाव और नस्लवाद का सामना किया।

टेरेटी बाज़ार की गलियों में 71 वर्षीय पॉल वेन की कहानी इस बदलते परिदृश्य की एक जीवंत तस्वीर पेश करती है। डायबिटीज़ के कारण उनकी आंखों की रोशनी लगभग चली गई है और वह दाहिने हाथ में छड़ी के सहारे मुश्किल से चल पाते हैं। ठंडी जनवरी की सुबह, जब कोलकाता की सड़कों पर ठंडी हवा बहती है, वे रोज़ टहलने निकलते हैं, भले ही यह उनके लिए बेहद कठिन हो।

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पॉल वेन कहते हैं कि उनके जीवन में अब कोई नहीं बचा है, जिसके साथ वह अपने सुख-दुख बांट सकें। उनके पिता द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान चीन से भारत आए थे और पॉल का जन्म कोलकाता में ही हुआ। परिवार और करीबी दोस्तों के अभाव में वे समुदाय के लोगों द्वारा बनाए गए भोजन पर निर्भर हैं।

टेरेटी बाज़ार की सड़कें ही अब उनका सामाजिक संसार हैं। चाय की दुकानों पर रुककर राहगीरों से बात करना उनके दिन का सबसे बड़ा सहारा है। पॉल वेन जैसे बुज़ुर्ग इस बात की गवाही हैं कि कैसे भारत की इकलौती चाइनाटाउन धीरे-धीरे स्मृतियों और इतिहास तक सिमटती जा रही है।

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