भारत ने नेपाल के लिपुलेख मार्ग पर आपत्ति को ठुकराया, कहा– क्षेत्रीय दावे अस्वीकार्य
भारत ने नेपाल की लिपुलेख मार्ग पर आपत्ति खारिज की। विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह पुराना तीर्थ मार्ग है और क्षेत्रीय दावे ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं हैं।
भारत ने नेपाल द्वारा कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिपुलेख दर्रे मार्ग को लेकर जताई गई आपत्ति को सख्ती से खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि किसी भी “एकतरफा और कृत्रिम रूप से बढ़ाए गए क्षेत्रीय दावे” स्वीकार्य नहीं हैं।
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने हाल ही में भारत और चीन द्वारा बिना काठमांडू से परामर्श किए लिपुलेख मार्ग से वार्षिक तीर्थयात्रा की तैयारी पर आपत्ति जताई थी। नेपाल का दावा है कि यह क्षेत्र उसके भूभाग में आता है।
भारत की ओर से विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जयसवाल ने स्पष्ट कहा कि भारत का रुख इस मुद्दे पर हमेशा से स्थिर और स्पष्ट रहा है। उन्होंने बताया कि लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा का एक पारंपरिक मार्ग रहा है और दशकों से इसका उपयोग किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि यह कोई नया घटनाक्रम नहीं है। भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि क्षेत्रीय दावे न तो ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित हैं और न ही उचित हैं। इसलिए ऐसे “एकतरफा और कृत्रिम दावे” स्वीकार नहीं किए जा सकते।
विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि भारत नेपाल के साथ सभी द्विपक्षीय मुद्दों पर रचनात्मक बातचीत के लिए तैयार है, जिसमें सीमा से जुड़े लंबित मामलों का समाधान भी शामिल है।
गौरतलब है कि विदेश मंत्रालय ने पिछले सप्ताह घोषणा की थी कि कैलाश मानसरोवर यात्रा जून से अगस्त के बीच दो मार्गों—लिपुलेख दर्रा और नाथू ला (सिक्किम)—से आयोजित की जाएगी।
कैलाश मानसरोवर यात्रा हिंदू, जैन और बौद्ध धर्मों के लिए अत्यंत धार्मिक महत्व रखती है। यह यात्रा चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में स्थित कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील तक होती है।
कोविड-19 और अन्य कारणों से लगभग पांच वर्षों के अंतराल के बाद यह यात्रा पिछले वर्ष फिर से शुरू की गई थी, जो भारत-चीन संबंधों को सामान्य करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया।
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