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पहाड़ों को चीरकर भविष्य से जुड़ाव: कैसे भारत की सुरंग परियोजनाएं बदल रही हैं देश का नक्शा

भारत में सुरंग निर्माण ने कनेक्टिविटी, सुरक्षा और विकास को नई दिशा दी है, जिससे दुर्गम क्षेत्रों में सालभर आवागमन, आर्थिक गतिविधि और रणनीतिक मजबूती सुनिश्चित हो रही है।

दशकों तक भारत में भौगोलिक परिस्थितियां आवागमन और विकास की दिशा तय करती रहीं। ऊंचे पर्वतीय दर्रे सर्दियों में बंद हो जाते थे, कमजोर सड़कें रक्षा गतिविधियों को धीमा कर देती थीं और कई दूरदराज़ क्षेत्र महीनों तक देश के बाकी हिस्सों से कटे रहते थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के बुनियादी ढांचे की समीक्षा करते हुए कहा है कि आधुनिक अवसंरचना को प्राकृतिक बाधाओं से ऊपर उठकर अंतिम छोर तक विकास पहुंचाना चाहिए। यही सोच अब जमीन के नीचे आकार ले रही है, जहां सुरंगें चुपचाप कनेक्टिविटी, सुरक्षा और रोजमर्रा के जीवन को नया स्वरूप दे रही हैं।

पहले भारत में सुरंग निर्माण एक सीमित और सतर्क प्रक्रिया थी। अधिकतर परिवहन मार्ग सतही सड़कों पर निर्भर थे, जो भूस्खलन, बर्फबारी और मौसम की मार से अक्सर बाधित हो जाते थे। निर्माण तकनीकें साधारण थीं, कार्य गति धीमी थी और दुर्गम क्षेत्रों की परियोजनाएं वर्षों तक लटकती रहती थीं। लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर और उत्तराखंड जैसे क्षेत्रों में संपर्क मौसमी बना रहता था, जिससे आम जनजीवन, आर्थिक गतिविधियों और रणनीतिक तैयारी पर असर पड़ता था।

पिछले एक दशक में यह तस्वीर निर्णायक रूप से बदली है। सुरंगें अब अपवाद नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजमार्गों, रेल परियोजनाओं और शहरी परिवहन की रीढ़ बन चुकी हैं। पीर पंजाल पर्वतमाला के नीचे बना अटल सुरंग इस बदलाव का प्रतीक है, जिसने रोहतांग दर्रे को बायपास कर दूरी और यात्रा समय घटाया तथा लाहौल-स्पीति को साल भर जोड़कर रक्षा लॉजिस्टिक्स को मजबूत किया।

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यह विस्तार रणनीतिक और तकनीकी दोनों स्तरों पर हुआ है। आधुनिक सुरंगों को अब पूर्ण परिवहन प्रणाली के रूप में डिजाइन किया जा रहा है, जिनमें वेंटिलेशन, अग्नि सुरक्षा, सीसीटीवी निगरानी, आपात निकास और केंद्रीकृत नियंत्रण कक्ष शामिल हैं। न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड और टनल बोरिंग मशीन जैसी उन्नत तकनीकों ने हिमालयी भूगोल और घनी शहरी संरचनाओं में भी सुरक्षित और गहरी सुरंगें संभव बनाई हैं।

जम्मू-कश्मीर और सीमावर्ती राज्यों में इसका प्रभाव सबसे स्पष्ट है। सोनमर्ग और प्रस्तावित जोजिला सुरंग श्रीनगर को लद्दाख से हर मौसम में जोड़ेंगी, जिससे यात्रा समय घटेगा, स्वास्थ्य सेवाओं और आपूर्ति में सुधार होगा तथा सैन्य आवाजाही मजबूत होगी। इसी तरह तेजपुर–तवांग मार्ग पर सेला सुरंग रणनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र को साल भर सुलभ बनाती है और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए नए अवसर खोलती है।

रेल क्षेत्र में भी समानांतर बदलाव दिख रहा है। उधमपुर–श्रीनगर–बारामूला रेल परियोजना की 12.77 किमी लंबी टी-50 सुरंग देश की सबसे लंबी परिवहन सुरंगों में शामिल है, जो कठिन चट्टानों और जल प्रवाह क्षेत्रों के बावजूद आधुनिक इंजीनियरिंग का उदाहरण है। शहरी भारत में, हुगली नदी के नीचे कोलकाता की अंडरवॉटर मेट्रो सुरंग ने 2024 में संचालन शुरू कर ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज की।

आने वाले समय में सुरंगों के लाभ केवल गति तक सीमित नहीं रहेंगे। ये ईंधन की बचत, प्रदूषण में कमी, व्यापारिक विश्वसनीयता और सीमावर्ती सुरक्षा को सशक्त बनाएंगी। नागरिकों के लिए इसका अर्थ है सुरक्षित, तेज और भरोसेमंद यात्रा। जैसे-जैसे जोजिला सुरंग, हिमालयी रेल कॉरिडोर और हाई-स्पीड रेल परियोजनाएं पूरी होंगी, भारत एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ेगा जहां भूगोल बाधा नहीं, बल्कि पहले ही हल की जा चुकी चुनौती होगा।

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