भारत-अमेरिका समझौता: पांच अहम सवाल अब भी अनसुलझे
भारत-अमेरिका के बीच टैरिफ घटाने का फैसला राहतभरा है, लेकिन मुक्त व्यापार समझौते, निवेश, रूसी तेल और चाबहार बंदरगाह जैसे कई अहम सवाल अब भी बने हुए हैं।
भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए व्यापारिक ऐलान ने भारतीय निर्यातकों को बड़ी राहत दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की है कि अमेरिका भारत पर लगाए गए “पारस्परिक” टैरिफ को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर देगा। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब पिछले एक साल से दोनों देशों के संबंधों में व्यापार और भू-राजनीतिक मुद्दों को लेकर तनाव देखा गया था।
टैरिफ में कटौती से भारत के कई निर्यात क्षेत्रों—जैसे कपड़ा, ऑटो पार्ट्स, फार्मास्यूटिकल्स और इंजीनियरिंग उत्पाद—को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे और निर्यात में बढ़ोतरी हो सकती है। साथ ही, यह संकेत भी मिलता है कि वाशिंगटन और नई दिल्ली अपने रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि, इस राहत के बावजूद कई अहम सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। सबसे बड़ा सवाल व्यापक मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को लेकर है—क्या दोनों देश वास्तव में किसी पूर्ण एफटीए की दिशा में आगे बढ़ेंगे या यह केवल सीमित टैरिफ समझौता ही रहेगा? दूसरा सवाल भारत द्वारा अमेरिका में किए जाने वाले निवेश प्रतिबद्धताओं को लेकर है, जिनका अभी तक कोई स्पष्ट खाका सामने नहीं आया है।
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इसके अलावा, रूस से तेल खरीद को लेकर भारत की नीति पर भी अनिश्चितता बनी हुई है। अमेरिकी नेतृत्व पहले ही इस मुद्दे पर कड़ा रुख दिखा चुका है, और यह साफ नहीं है कि इस समझौते के बाद भारत पर कोई अतिरिक्त दबाव डाला जाएगा या नहीं। ईरान के चाबहार बंदरगाह से जुड़े भारतीय हित भी चर्चा में हैं, क्योंकि यह परियोजना क्षेत्रीय कूटनीति और व्यापार के लिहाज से अहम मानी जाती है।
कुल मिलाकर, टैरिफ में कटौती एक सकारात्मक कदम जरूर है, लेकिन भारत-अमेरिका आर्थिक साझेदारी की पूरी तस्वीर अभी स्पष्ट नहीं है। आने वाले महीनों में इन अनसुलझे सवालों के जवाब दोनों देशों के रिश्तों की दिशा तय करेंगे।
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