भारतीय नौसेना को मिला तीसरा स्वदेशी पनडुब्बी रोधी युद्धपोत ‘मांगरोल’
भारतीय नौसेना को तीसरा स्वदेशी एएसडब्ल्यू शैलो वॉटर क्राफ्ट ‘मांगरोल’ मिला। अत्याधुनिक हथियारों और 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री वाला पोत तटीय सुरक्षा मजबूत करेगा।
भारतीय नौसेना को 21 अगस्त को स्वदेशी रूप से निर्मित तीसरा एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी) ‘मांगरोल’ प्राप्त हुआ। इस युद्धपोत का निर्माण कोच्चि में कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा किया गया है। यह पोत भारत की स्वदेशी जहाज निर्माण क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
‘मांगरोल’ में 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है। इसे विशेष रूप से तटीय और उथले समुद्री क्षेत्रों में पानी के भीतर निगरानी तथा पनडुब्बी रोधी युद्ध अभियानों के लिए डिजाइन किया गया है। यह पोत कम तीव्रता वाले समुद्री अभियानों और माइन वारफेयर यानी समुद्री बारूदी सुरंगों से संबंधित अभियानों को भी अंजाम देने में सक्षम है।
युद्धपोत को अत्याधुनिक वॉटरजेट प्रणोदन प्रणाली से लैस किया गया है, जिससे इसकी संचालन क्षमता और गतिशीलता में वृद्धि होती है। इसके अलावा इसमें आधुनिक टॉरपीडो, पनडुब्बी रोधी रॉकेट, रडार और सोनार प्रणालियां भी स्थापित की गई हैं। ये उपकरण समुद्र के भीतर दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और उनके खिलाफ प्रभावी कार्रवाई करने में मदद करेंगे।
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इस पोत का नाम गुजरात के जूनागढ़ जिले के तटीय नगर और छोटे बंदरगाह मांगरोल के नाम पर रखा गया है। मांगरोल समुद्री मत्स्य उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण बंदरगाह के रूप में जाना जाता है। यह नाम भारतीय नौसेना के पूर्व माइंसवीपर पोत ‘आईएनएस मांगरोल’ की विरासत को भी आगे बढ़ाता है, जिसने वर्ष 2004 तक नौसेना में सेवा दी थी।
‘मांगरोल’ की डिलीवरी भारतीय नौसेना के स्वदेशी युद्धपोत निर्माण कार्यक्रम में एक और महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह उपलब्धि सरकार की आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत देश के घरेलू रक्षा विनिर्माण क्षेत्र की बढ़ती तकनीकी और उत्पादन क्षमताओं को भी दर्शाती है।
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