भारत की सबसे बड़ी जलवायु खाई शायद भाषा है
जलवायु परिवर्तन पर भारत में सबसे बड़ी चुनौती डेटा नहीं, बल्कि जटिल भाषा है, जिससे ‘लॉस एंड डैमेज’ जैसे अहम मुद्दों का असली अर्थ जमीनी स्तर तक नहीं पहुंच पाता।
भारत में जलवायु परिवर्तन से जुड़े विमर्श की सबसे बड़ी चुनौती आंकड़ों या वैज्ञानिक शोध की कमी नहीं, बल्कि भाषा और जटिल शब्दावली है। आज हमारे पास पहले से कहीं अधिक डेटा उपलब्ध है, लेकिन यह स्पष्टता कम होती जा रही है कि इस जानकारी का सही मायने में उपयोग कहां और कैसे किया जाए। यदि विज्ञान संप्रेषण में कोई गंभीर अंतर है, तो वह है सरल, समझने योग्य और लोगों से जुड़ने वाली भाषा का अभाव।
जब तक वैज्ञानिक जानकारी को ऐसी भाषा में नहीं बताया जाएगा जिसे आम लोग अपने अनुभवों से जोड़ सकें और स्थानीय संदर्भों में समझ सकें, तब तक विज्ञान या तो अधूरा समझा जाएगा या पूरी तरह गलत समझा जाएगा। यह समस्या विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन जैसे विषयों में अधिक गहराई से दिखाई देती है।
हाल के संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलनों में ‘लॉस एंड डैमेज’ (हानि और क्षति) शब्द का बार-बार इस्तेमाल किया गया है। यह शब्द वार्ताओं में दोहराया गया, मसौदों में शामिल किया गया और प्रेस ब्रीफिंग में इस तरह चर्चा का विषय बना, मानो इसका अर्थ सभी को स्पष्ट हो। लेकिन ‘लॉस एंड डैमेज’ केवल एक कूटनीतिक शब्द नहीं है। इसका अर्थ उन जलवायु प्रभावों से है, जिनके साथ समुदाय अनुकूलन नहीं कर सकते।
और पढ़ें: मोज़ाम्बिक में मूसलाधार बारिश से तबाही, भीषण बाढ़ में हजारों लोग बेघर
इसमें फसलों और घरों का नष्ट होना ही नहीं, बल्कि पहचान, जमीन, परंपराओं, पारिस्थितिकी तंत्र और सांस्कृतिक स्मृतियों का धीरे-धीरे मिट जाना भी शामिल है। यह अवधारणा केवल टूटी हुई चीज़ों को नहीं दर्शाती, बल्कि उन नुकसानों को भी रेखांकित करती है, जिन्हें कभी वापस नहीं लाया जा सकता।
लेकिन वैश्विक वार्ता की मेज और जमीनी स्तर पर शासन की वास्तविकताओं के बीच कहीं न कहीं इस शब्द का असली अर्थ खो जाता है। जब नीतियां स्थानीय भाषा और संदर्भ में नहीं उतरतीं, तो वे लोगों के जीवन को प्रभावित करने के बजाय केवल दस्तावेज़ों तक सीमित रह जाती हैं। यही कारण है कि भारत जैसे बहुभाषी देश में जलवायु कार्रवाई की सबसे बड़ी बाधा भाषा बनती जा रही है।
और पढ़ें: ट्रंप ने अमेरिका को प्रमुख जलवायु संधि और वैज्ञानिक निकाय से बाहर किया: व्हाइट हाउस