भारत में डिमेंशिया देखभाल की चुनौती: जब पति धीरे-धीरे पत्नी को भूलने लगा
भारत में बढ़ते डिमेंशिया मामलों के बीच परिवार भावनात्मक और मानसिक संघर्ष झेल रहे हैं। रेवती की कहानी पति की बीमारी और देखभाल प्रणाली की चुनौतियों को उजागर करती है।
भारत में डिमेंशिया के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है और इसके साथ ही लाखों परिवार अपराधबोध, मानसिक थकान और टूटते रिश्तों का सामना कर रहे हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था भी अभी इस बीमारी से निपटने के तरीके सीखने के दौर में है। इस चुनौती की एक झलक मुंबई की 70 वर्षीय रेवती की कहानी में साफ दिखाई देती है, जिनके पति धीरे-धीरे उन्हें पहचानना तक भूलने लगे।
रेवती को आज भी वह दिन याद है, जब कोविड-19 महामारी के दौरान उनके पति को अचानक नौकरी से रिटायर होना पड़ा। यह बदलाव उनके पति के लिए बेहद झकझोर देने वाला था। “मैं उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ देख सकती थी,” रेवती याद करती हैं। “इसके बाद वे चिड़चिड़े और गुमसुम रहने लगे। जिन चीज़ों से उन्हें पहले खुशी मिलती थी, उनमें उनकी रुचि खत्म हो गई। शुरुआत में मुझे लगा कि यह अवसाद है, लेकिन असलियत इससे कहीं ज्यादा गंभीर थी।”
मुंबई में रहते हुए, जब उनके पति छोटी-छोटी बातें भूलने लगे और एक ही सवाल बार-बार पूछने लगे, तो रेवती उन्हें मनोचिकित्सक के पास ले गईं। न्यूरो-कॉग्निटिव जांच के बाद सच्चाई सामने आई—उन्हें डिमेंशिया हो चुका था। यह निदान रेवती के लिए दिल तोड़ने वाला था, लेकिन पूरी तरह अनजान भी नहीं। महज एक साल पहले ही उनकी ननद भी इसी बीमारी के उन्नत चरण में पहुंच चुकी थीं।
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“मेरे पति ही उन्हें पुणे के प्रतिति एल्डर केयर होम लेकर गए थे। मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन मुझे अपने पति को भी वहीं ले जाना पड़ेगा,” रेवती भावुक होकर कहती हैं। उन्होंने अपने पति की देखभाल घर पर करने की पूरी कोशिश की, लेकिन समय के साथ यह बेहद कठिन होता गया।
यह कहानी भारत में डिमेंशिया से जूझ रहे उन अनगिनत परिवारों की सच्चाई बयां करती है, जहां देखभाल करने वाले खुद मानसिक और शारीरिक रूप से टूटने लगते हैं और एक मजबूत सहायक व्यवस्था की सख्त जरूरत महसूस होती है।
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