कश्मीर की 15वीं सदी की आली मस्जिद के संरक्षण कार्य पर INTACH की चिंता
INTACH ने कहा कि सरकार के हालिया संरक्षण कार्यों से कश्मीर की 15वीं सदी की आली मस्जिद की ऐतिहासिक पहचान को नुकसान और नमी बढ़ने का खतरा है।
भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत न्यास (INTACH) ने कश्मीर की 15वीं सदी की ऐतिहासिक आली मस्जिद में चल रहे संरक्षण और विकास कार्यों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। INTACH का कहना है कि जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा शुरू किए गए नवीन हस्तक्षेपों के कारण यह मस्जिद अपनी ऐतिहासिक और स्थापत्य पहचान खोती जा रही है।
आली मस्जिद कश्मीर की दूसरी सबसे बड़ी हाइपोस्टाइल मस्जिद है और इसका ऐतिहासिक महत्व अत्यंत विशेष माना जाता है। INTACH के अनुसार, हालिया संरक्षण कार्यों में वैज्ञानिक कारणों का हवाला देते हुए मस्जिद के खुले ईंट-चिनाई वाले फर्श पर सीमेंट कंक्रीट का उपयोग किया गया है। संस्था का मानना है कि यह तकनीक संरचना के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है।
INTACH की कश्मीर चैप्टर के संयोजक सलीम बेग ने कहा कि खुले ईंट-चिनाई वाला ढांचा इमारत को “सांस लेने” की सुविधा देता है, जिससे नमी वाष्पीकरण के जरिए बाहर निकल जाती है और दीवारों व फर्श में सीलन कम रहती है। लेकिन सीमेंट कंक्रीट के इस्तेमाल से यह प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित हो गई है, जिससे पूरी संरचना में अत्यधिक नमी फैलने का खतरा बढ़ गया है।
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उन्होंने आशंका जताई कि यदि यही तरीका जारी रहा तो हर गुजरते वर्ष के साथ 15वीं सदी की यह ऐतिहासिक इमारत कमजोर होती चली जाएगी। INTACH ने सरकार से आग्रह किया है कि संरक्षण कार्यों में पारंपरिक निर्माण तकनीकों और मूल स्थापत्य शैली का सम्मान किया जाए, ताकि विरासत संरचना की प्रामाणिकता बनी रहे।
संस्था ने यह भी स्पष्ट किया कि विकास और संरक्षण के नाम पर ऐसे हस्तक्षेप नहीं होने चाहिए, जो ऐतिहासिक धरोहरों को दीर्घकालीन क्षति पहुंचाएं। आली मस्जिद जैसी धरोहरों का संरक्षण अत्यंत संवेदनशीलता और विशेषज्ञ सलाह के साथ किया जाना आवश्यक है।
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