अमेरिका-ईरान समझौते से इजरायल चिंतित, नेतन्याहू ने दक्षिणी लेबनान से सेना हटाने से किया इनकार
अमेरिका-ईरान समझौते के बाद इजरायल ने दक्षिणी लेबनान में सेना बनाए रखने का निर्णय लिया है। नेतन्याहू को आशंका है कि यह समझौता हिज्बुल्लाह और क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन को प्रभावित करेगा।
अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए अंतरिम शांति समझौते के बाद पश्चिम एशिया में भूराजनीतिक तनाव बढ़ गया है। इस समझौते को लेकर इजरायल की चिंता गहराती जा रही है। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिका-ईरान एमओयू की अनदेखी करते हुए स्पष्ट किया है कि इजरायली सेना दक्षिणी लेबनान में तब तक बनी रहेगी, जब तक सुरक्षा कारणों से इसकी आवश्यकता होगी।
सूत्रों के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच लंबे संघर्ष के बाद 14 बिंदुओं वाला एक समझौता ज्ञापन (MoU) तैयार किया गया है, जिसमें लेबनान में सैन्य गतिविधियों को समाप्त करने का प्रावधान भी शामिल है। इस समझौते में कहा गया है कि सभी पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ युद्ध या सैन्य कार्रवाई को रोकेंगे और लेबनान की संप्रभुता का सम्मान करेंगे।
हालांकि, इजरायल को आशंका है कि अमेरिका और ईरान की बढ़ती नजदीकी से लेबनान में ईरान समर्थित संगठन हिज्बुल्लाह को मजबूती मिल सकती है, जिससे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बदल सकता है। इजरायल को यह भी डर है कि अमेरिका भविष्य में उसकी सैन्य कार्रवाइयों पर आपत्ति जता सकता है।
रिपोर्टों के अनुसार, इजरायली अधिकारी मानते हैं कि यह समझौता अमेरिका और इजरायल के बीच हिज्बुल्लाह के खिलाफ संयुक्त रणनीति को कमजोर कर सकता है। साथ ही, वाशिंगटन दक्षिणी लेबनान से इजरायली सैनिकों की वापसी का दबाव भी बना सकता है।
इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने दोहराया है कि इजरायल अपनी सुरक्षा से किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि जब तक नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती, तब तक सेना लेबनान में बनी रहेगी।
सूत्रों के मुताबिक, नेतन्याहू इस समझौते में ईरान के परमाणु मुद्दे से अधिक लेबनान से जुड़े प्रावधानों को लेकर चिंतित हैं। उनका मानना है कि यह क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
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