अगर न्यायपालिका की विश्वसनीयता खत्म हुई तो कुछ भी नहीं बचेगा: जस्टिस उज्ज्वल भुयान
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुयान ने कहा कि यदि न्यायपालिका की विश्वसनीयता खत्म हुई तो उसका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा और केंद्र को जजों के तबादलों में दखल नहीं देना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुयान ने शनिवार (24 जनवरी, 2026) को न्यायपालिका की विश्वसनीयता को लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी बताते हुए कहा कि यदि न्यायपालिका अपनी साख खो देती है, तो उसका अस्तित्व ही अर्थहीन हो जाएगा। पुणे में एक विधि महाविद्यालय के छात्रों और शिक्षकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों को ऐसा नहीं दिखना चाहिए कि वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता या मानवाधिकारों से इनकार को सही ठहराने के लिए किसी तरह का दबाव स्वीकार कर रहे हैं।
जस्टिस उज्ज्वल भुयान ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्यायपालिका का मूल कर्तव्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि अदालतें स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के मामलों में संवेदनशीलता खो देंगी, तो जनता का भरोसा डगमगा जाएगा। “अगर हमारी विश्वसनीयता चली गई, तो न्यायपालिका में कुछ भी शेष नहीं रहेगा”।
न्यायाधीशों के स्थानांतरण और नियुक्तियों के मुद्दे पर बोलते हुए जस्टिस उज्ज्वल भुयान ने कहा कि केंद्र सरकार का इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा, “चीजों की प्रकृति के अनुसार ही केंद्र का न्यायाधीशों के तबादले और तैनाती में कोई रोल नहीं हो सकता।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता तभी बनी रह सकती है, जब कार्यपालिका और विधायिका उससे पर्याप्त दूरी बनाए रखें।
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उन्होंने कानून के विद्यार्थियों से अपील की कि वे न्यायिक संस्थाओं की भूमिका को केवल कानूनी ढांचे के रूप में न देखें, बल्कि इसे नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों के रक्षक के रूप में समझें। जस्टिस उज्ज्वल भुयान ने कहा कि एक मजबूत और निष्पक्ष न्यायपालिका ही लोकतंत्र को जीवित रख सकती है।
अपने संबोधन में उन्होंने यह भी कहा कि न्यायाधीशों को हर फैसले में यह ध्यान रखना चाहिए कि उनका निर्णय न केवल कानूनी दृष्टि से सही हो, बल्कि नैतिक और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप भी हो। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यायपालिका की साख बनाए रखना हर न्यायाधीश की सामूहिक जिम्मेदारी है।
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